संतान

संतान | STORY BY ANITA

 

 

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आज सुशीला बहुत खुश थी। आखिर कर इतनी मन्नतों के बाद उसके घर बेटा जो पैदा हुआ था।

आज उसके घर में लोगों की भीड़ थी। लोग आ रहे थे जा रहे थे उसे बधाइयां दे रहे थे।

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सुशीला के विवाह को 10 साल हो गए थे। लेकिन मां बनने का सौभाग्य अभी तक उसके किस्मत में नहीं लिखा था।

उसकी गोद भर सके, इसके लिए वह ना जाने कितने मंदिरों में गई ,ना जाने कितने तीर्थ स्थानों में गई ,

देवता तो ठीक उसने ना जाने कितनों पत्थरों को भी पूजा।

आखिरकार आज मां बनने का सौभाग्य उसे मिल ही गया था।

सुशीला एक बहुत ही साधारण परिवार की स्त्री थी। उसके पति रमेश भी बहुत ही साधारण व्यक्ति थे।

रमेश एक छोटे से कारखाने में जाकर काम करते थे और अपने घर की आजीविका को चलाया करते थे।

दोनों बहुत खुश थे। दोनों एक दूसरे के साथ बहुत प्यार से रहते थे और एक दूसरे को सहयोग देते थे ।

बस कमी थी तो एक संतान की। आज वह कमी भी पूरी हो गई थी। दोनों ने मिलकरअपने बेटे का नाम रतन रखा।

हालांकि वह दोनों एक बहुत ही साधारण परिवार के थे लेकिन फिर भी वह दोनों रतन की परवरिश एक राजकुमार की तरह किया करते थे।

कभी भी रतन को कोई कमी नहीं होने देते थे रतन की जो इच्छा होती वह पूरी किया करते थे। अब रतन धीरे-धीरे बड़ा होने लगा था।

रमेश और सुशीला को यह चिंता सताने लगी थी की वह रतन का एडमिशन किसी अच्छे स्कूल में कैसे करवाएंगे क्योंकि वह बहुत ही साधारण परिवार से थे।

और अच्छे-अच्छे कान्वेंट स्कूलों की फीस बहुत महंगी थी । जो कि वह नहीं भर सकते थे।

रमेश सुशीला से कहता है,  देखो भाग्यवान हम इतने धनवान तो है नहीं कि हम अपने बेटे को किसी अच्छे अंग्रेजी स्कूल में पढ़ा सकें।

इसलिए मेरा कहना मानो हम रतन को पास के ही अंग्रेजी स्कूल में डाल देंगे पढ़ाई वहां भी तो होती है।

इस पर सुशीला नाराज हो गई। उसने रमेश से कहा देखो जी हमारे एक ही तो संतान है अगर हम उसके लिए भी कुछ नहीं कर सके तो धिक्कार है हमारी जिंदगी पर।

मुझे नहीं पता आप कैसे करोगे, लेकिन मैं चाहती हूं कि हमारे बच्चे का दाखिला इस शहर के सबसे बड़े स्कूल में हो।

अगर आपने मेरा कहना नहीं माना तो आप की कसम मैं और अन्न और जल दोनों त्याग दूंगी। आगे आपकी मर्जी।

सुशीला की यह बातें सुनकर रमेश के होश उड़ गए। लेकिन वह सुशीला को बहुत प्यार करता था इसलिए सुशीला की बात को टाल ना सका।

अगले दिन रमेश शहर के सबसे बड़े स्कूल में गया ताकि रतन का एडमिशन वहां करा सके। लेकिन वहां की फीस सुनकर रमेश के पैरों के तले की जमीन खिसक गई।

50000  रुपए रमेश के लिए बहुत अधिक थे। उसने इधर उधर से जोड़कर 20  से 25000 जमा कर रखे थे। लेकिन यहां की फीस तो रमेश की सोच से बहुत अधिक थे। रमेश निराश हो गया।

रमेश मुंह लटकाए घर पहुंचा तो सुशीला ने उसके उदास होने का कारण पूछा।

रमेश बहुत ही धीमी आवाज में बोलता है कि वहां की फीस बहुत ही अधिक है और मेरे पास कुल मिलाकर सिर्फ ₹25000 हैं।

बाकी के 25000 मै कहां से लाऊंगा। सुशीला मुस्कुराई। और रमेश से कहती है मेरे होते हुए तुम क्यों चिंता करते हो जब मैं हूं तो तुम्हें परेशान होने की जरूरत नहीं है।

और फिर सुशीला अंदर चली जाती है। अंदर से जाकर सुशीला अपने सारे गहने उठा लाती है और बोलती है लो इन्हें गिरवी रखकर पैसे ले आओ इतने गहनों के तो ₹25000 आराम से मिल जाएंगे।

पहले रमेश मना करता है लेकिन सुशीला के ज़िद्द केआगे उसकी एक नहीं चलती।

रतन का एडमिशन शहर के सबसे बड़ी स्कूल में हो जाता है। सुशीला और रतन दोनों बहुत खुश थे। लेकिन रमेश को यह चिंता सता रही थी इतने महंगे स्कूल का खर्चा वह कैसे उठा पाएगा।

रात हो चुकी थी रतन सो गया था सुशीला भी लेटी हुई थी उसने देखा कि रमेश अभी तक जाग रहा है। सुशीला ने रमेश से उसके जागने का कारण पूछा।

रमेश ने सुशीला का हाथ अपने हाथ में लिया और कहा हमने रतन का दाखिला करवा तो दिया है लेकिन इतने महंगे स्कूल का खर्चा हम कैसे उठाएंगे।

सुशीला भी थोड़ी सी परेशान हुई लेकिन उसने फिर कहा कि हम दोनों मिलकर काम करेंगे और पैसे कमाएंगे।

सुशीला ने भी अपने घर में ही रह कर सिलाई का काम शुरू कर दिया।

एक दिन की बात है सुशीला सिलाई कर रही थी, इतने में रतन स्कूल से घर  आया। रतन बहुत उदास लग रहा था।

सुशीला ने रतन के उदास होने की वजह पूछी तो वह रोकर सुशीला के गले से लिपट कर रोने लगा। सुशीला घबरा गई।

सुशीला ने फिर रतन को शांत करवाते हुए पूछा क्या बात है मेरा राजा बेटा रो क्यों रहा है?

मां की बात सुनकर रतन कुछ शांत हुआ फिर बोला मां स्कूल में बच्चे बहुत अच्छा अच्छा खाना लेकर आते हैं और मेरा खाना देखकर सब हंसते हैं

इसलिए मुझे स्कूल नहीं जाना। सुशीला थोड़ा सा हंसती है फिर बोलती है बेटा कल से तुम्हें भी मैं अच्छा अच्छा खाना बनाकर भेजूंगी रतन खुश हो जाता है और अंदर चला जाता है।

सुशीला अपना काम खत्म करके बाजार से नए तरीके की खाना बनाने की किताब लेकर आती है और सामान लेकर आती है

और अगले दिन से रतन को बिल्कुल वैसा ही खाना बना कर देती थी जैसा कि रतन के स्कूल में रतन के सारे दोस्त लेकर आया करते थे।

1 दिन की बात है सुशीला अपने घर पर काम कर रही थी तभी पड़ोस का एक लड़का उसके पास आया वह बहुत थका हुआ लग रहा था

और लग रहा था कि कई दिनों से उसने ढंग का खाना भी नहीं खाया है। सुशीला ने उसे अंदर बुलाया और पूछा बेटा तुम ऐसे परेशान क्यों लग रहे हो।

लड़के ने अपनी सारी बातें सुशीला को बाताई।

लड़के का नाम धीरज था। धीरज की मां को मरे हुए एक महीना हो गया था और उसके पापा उसका ध्यान नहीं रखते थे

कई कई दिनों तक घर पर नहीं आते हैं। इसलिए धीरज भूखा ही रहता है उसका ध्यान रखने वाला भी कोई नहीं है घर में।

धीरज की बातें सुनकर सुशीला को बहुत बुरा लगता है और सुशीला धीरज को गले से लगा लेती है।

सुशीला धीरज से बोलती है बेटा मुझे तुम अपनी मां ही समझो मैं तुम्हारी मां के जैसे ही हूं।

सुशीला धीरज को नहाने के लिए कहती है और उसे साफ-सुथरे कपड़े पहनने के लिए देती है।

फिर उसके लिए खाना परोसती है। कई दिनों के बाद धीरज ने इतना अच्छा खाना खाया था खाना खाने के बाद उसे नींद आ गई और वह वहीं पर सुशीला की गोद में सो गया।

अब ऐसा कोई दिन नहीं जाता था कि धीरज सुशीला के पास ना आता हो। सुशीला भी धीरज से मिलकर बहुत खुश होती थी।

धीरज का ऐसा ही ध्यान रखती थी जैसे कि वह रतन का ध्यान रखती थी दोनों को वह अपना बेटा मानती थी और दोनों में कोई फर्क नहीं करती थी ऐसे कई साल बीतते चले गए। रतन और धीरज दोनों बहुत बड़े हो गए थे।

1 दिन की बात है सुशीला अपने बेटे की स्कूल में गई थी वहां वह उसके दोस्तों से मिली लेकिन यह बात रतन को पसंद नहीं आई

और घर पर आकर रतन सुशीला पर गुस्सा होने लगा।रतन की यह बात सुनकर रमेश को बहुत गुस्सा आया उसने कहा कि यह तुम्हारी मां है तुम्हें ऐसी बात नहीं करनी चाहिए।रतन ने भी चिल्लाते हुए कहा तो मैं क्या कहूं मेरे सारे दोस्तों की मां बहुत पढ़ी-लिखी हैं।

उनका पहनावा बहुत अच्छा है सभी की मां को इंग्लिश में बात करनी आती है लेकिन मां ऐसे चली गई ना कपड़े पहनने का ढंग है

मां को और ना ही इंग्लिश बोलना आता है मेरी कितनी बेइज्जती हुई मेरे दोस्तों के सामने। रमेश ने रतन की यह बात सुनकर रमेश ने रतन को जोरदार का एक तमाचा मारा।

रतन गुस्से से पैर पटक ते हुए अपने कमरे में चला गया।

सुशीला वही खड़ी है सब देख रही थी अंदर ही अंदर उसे रतन की यह बात चुभ गई।

उस दिन से सुशीला ने ठान लिया था कि वह भी अंग्रेजी बोलना सीखेगी। अगले ही दिन से सुशीला ने अंग्रेजी सीखना शुरू कर दिया और वह बहुत अच्छा अंग्रेजी भी बोलने लग गई थी।

सुशीला ने ना सिर्फ अंग्रेजी बोलना सीखा बल्कि उसने अपने रहने का तौर तरीका भी बदला ताकि रतन को उसकी वजह से रतन के दोस्तों के सामने बेइज्जत ना होना पड़े।

रमेश हमेशा सुशीला को समझाता था कि रतन को इतना सर पर चढ़ाना अच्छी बात नहीं है लेकिन सुशीला हमेशा रमेश को बोलती हमारी एक ही तो संतान है

जो कुछ है यही तो है हमारा। सुशीला के इस तर्क के सामने रमेश कुछ भी नहीं बोल पाता था।

सुशीला और रमेश बहुत मेहनत कर रहे थे दोनों की मेहनत रंग लाई अब रमेश एक बहुत बड़ा व्यापारी बन चुका था उसका बहुत रूतवा हो गया था।

आज सुशीला बहुत परेशान नजर आ रही थी क्योंकि आज धीरज उससे मिलने घर नहीं आया था।

सुशीला ने कुछ देर तक इंतजार किया फिर उसका पता लेने के लिए उसके घर गई।

वहां गई तो उसे पता चला कि धीरज के पिता उसे लेकर किसी दूसरे शहर में चले गए हैं सुशीला को यह सुनकर बहुत बुरा लगा और वह बहुत दुखी हो गई।

धीरे-धीरे दिन बीतते चले गएI

After 10 years

रतन अब बड़ा हो चुका था उसके स्कूल की पढ़ाई भी खत्म हो गई थी आगे की पढ़ाई के लिए वह विदेश चला गया।

यहां सुशीला भी रमेश के साथ अपना वक्त बहुत अच्छे से गुजारती थी और पुरानी बातें याद किया करती थी। एक दिन ऐसा भी आया जब रतन घर आ गया और उसकी बहुत अच्छी जॉब लग गई थी। सुशीला ने रतन की शादी रतन के पसंद की लड़की के साथ करवा दी।

पूरा परिवार बहुत हंसी खुशी से रहता था।

अचानक परिवार में दुखों का पहाड़ टूट पड़ा। रमेश बहुत बीमार पड़ गया और एक दिन उसकी मृत्यु हो गई।

रमेश की मृत्यु से सुशीला बहुत दुखी हो गई थी और अपने आप को एक कमरे में ही बंद करके रखती थी।

पिता की मृत्यु के बाद रतन का भी व्यवहार सुशीला के साथ बदल गया था।

रतन की पत्नी जिसका नाम रजनी था उसे भी अब सुशीला पसंद नहीं आती थी। सुशीला और रजनी में छोटी-छोटी बातों पर बहस होने लग गई थी।

रजनी को बिल्कुल भी पसंद नहीं था कि सुशीला की मां उसके किसी भी काम में या फिर उसके रहन-सहन के तौर-तरीकों में दखल दे।

1 दिन की बात है रजनी और सुशीला में छोटी सी बात को लेकर बहस हो गई सुशीला ने प्यार से रजनी को समझाया बेटा घर की बहुओं को यह शोभा नहीं देता कि देर रात तक वह घर से बाहर रहे और दोस्तों के साथ पार्टी करें।

रजनी को सुशीला की यह बात बिल्कुल पसंद नहीं आई और रतन के आते ही रजनी रतन पर बरस पड़ी।

रतन भी आए दिन झगड़ों से परेशान हो चुका था लेकिन वह रजनी को समझाने की वजह मां को ही दोष देने लगा।रतन का यह व्यवहार देखकर सुशीला बुरी तरीके से टूट गई।

रजनी रतन से नाराज होकर अपने कमरे में चली गई।

रतन रजनी  को मनाने के लिए अंदर गया। रजनी ने कहा या तो इस घर में तुम्हारी मां रहेंगी या फिर मैं रहूंगी दोनों में से तुम्हें किसी एक को चुनना होगा।

रतन ने कहा अगर तुम्हारी यही इच्छा है तो ऐसा ही होगा और वह वहां से उठकर बाहर चला गया।

अगले दिन सुबह सुबह रतन ने मां को तैयार होने के लिए कहा।

मां जल्दी तैयार हो जाओ आज मैं तुम्हें मंदिर ले चल रहा हूं बहुत दिन हो गए हैं हम दोनों एक साथ कहीं घूमने नहीं गए हैं।

रतन का ऐसा व्यवहार देखकर सुशीला बहुत खुश हुई और मंदिर जाने के लिए तैयार हो गई।

रतन और सुशीला मंदिर के लिए रवाना हो गए।रतन को कार चलाते बहुत देर हो गए तो सुशीला भी परेशान होकर पूछने लगी बेटा हम कौन से मंदिर जा रहे हैं?

मां तुम परेशान क्यों होती हो हम शहर से दूर वाले मंदिर में जा रहे हैं सुना है वहां पर जाने से इंसान के सभी दुख दूर हो जाते हैं।

सुशीला रतन की बात मान गई।

करीबन 2 घंटे बाद रतन सुशीला को एक अनजान जगह में ले आया और सुशीला को नीचे उतरने के लिए कहा।

उसने कहा मां भूख लगी है चलो हम कुछ खा लेते हैं।

सुशीला कार से बाहर आ गई और एक जगह खड़ी हो गई।

रतन पास की दुकान में गया वहां से कुछ खाने का सामान लेकर आया और कहा मां चलो पास में ही पार्क है

वहीं पर बैठकर हम यह खा लेते हैं फिर मंदिर चलेंगे मैं भी थक गया हूं तो थोड़ा सा आराम कर लूंगा।

सुशीला ने भी हामी भर दी और दोनों पार्क में चले गए।

दोनों ने नाश्ता किया तभी सुशीला को प्यास लगी उसने कहा बेटा रतन प्यास लगी है पानी तो लाना भूल गए।

रतन ने कहा सॉरी मां मैं पानी लाना भूल गया तुम यहीं बैठो।

मैं जा कर पानी लाता हूं। और वह वहां से उठकर चला गया।

रतन अपनी कार में गया और का स्टार्ट कर दी यह देखकर सुशीला हैरान हो गई और वहां से दौड़ कर आई और बोली बेटा रतन कहां जा रहे हो?

रतन ने सुशीला की कोई बात नहीं सुनी और का स्टार्ट कर के चला गया।

सुशीला भी रतन के कार के पीछे पीछे भागने लगी और जाकर एक दूसरी कार से टकरा गई और वही बेहोश होकर गिर गई। जिस कार से सुशीला टकराई थी सौभाग्य से वह कार धीरज की थी।

धीरज ने सुशीला को पहचान लिया था। धीरज ने सुशीला को उठाया और उसे हॉस्पिटल ले गया।

सुशीला को भी होश आ गया था लेकिन वह धीरज को पहचान नहीं पाई थी। धीरज सुशीला को अपने घर ले आया।

धीरज के घर गई तो उसने देखा सुशीला की बहुत बड़ी सी पेंटिंग घर पर लगी हुई है। सुशीला अपनी फोटो देखकर हैरान हो गई।

बेटा तुम कौन हो?    धीरज भावुक होकरकर बोला मां आप मुझे नहीं पहचान पाईं। मैं आपका बेटा धीरज।

धीरज की बातें सुनकर सुशीला धीरज को गले लगा लेती है।  धीरज सुशीला से पूछता है कि वह इस शहर में कैसे आई?

सुशीला अपने साथ हुई सारी बात धीरज को बता देती है और रोने लगती है।

धीरज सुशीला को शांत करवाता है और कहता है मैं आप ही का बेटा हूं मा।

 

आपने मुझे जन्म नहीं दिया लेकिन मुझे पाल पोस कर बड़ा किया है एक मां की तरह।

आपको अब कहीं जाने की जरूरत नहीं है आप यही मेरे साथ मेरे घर में  रहेंगी।

धीरज की यह बातें सुनकर सुशीला बाबू को जाती है और उसकी आंखों से आंसू निकल आते हैं।

धीरज मां के आंसू पूछता है और पूरा घर दिखाता है। धीरज को पता था सुशीला बहुत ही होशियार है इसलिए धीरज सुशीला को अपनी कंपनी का ऑनर बना देता है।

सुशीला धीरज से मना करती है बेटा यह सब मैं नहीं कर पाऊंगी लेकिन धीरज नहीं मानता और जबरदस्ती करके सुशीला को मना लेता है फिर सुशीला भी धीरज का मन रखने के लिए मान जाती है।

सुशीला ने धीरज के office में आना जाना शुरू कर दिया।

और धीरे-धीरे ऑफिस का सारा काम सीख गई थी। ऑफिस के स्टाफ को सुशीला का व्यवहार बहुत पसंद आता था।

अब धीरज के कंपनी की सारी देखरेख सुशीला ही करती थी। धीरज भी अपनी मां को पाकर बहुत खुश था।

जब कभी भी सुशीला को अपने पुराने दिन याद आते थे तो सुशीला दुखी हो जाती थी

लेकिन धीरज बड़े ही प्यार से सुशीला को मना लेता था धीरज ने कभी ऐसा एहसास नहीं होने दिया कि सुशीला उसकी सगी मां नहीं है।

सुशीला भी धीरज से बहुत प्यार करने लगी थी और कभी-कभी सोचती थी मेरा वह बेटा जिसे मैंने जन्म दिया है और मेरा यह बेटा जिसे मैंने पाला है दोनों में कितना फर्क है।

इधर रतन भी रजनी के साथ काफी खुश रहने लगा था।

रतन उसी कंपनी में जॉब करता था जिस कंपनी की मालकिन सुशीला थी

ना यह बात सुशीला को पता थी ना ही रतन को।

Few years later. Meeting of Ratan and Sushila.

रतन काफी खुश था क्योंकि उसका प्रमोशन होने वाला था।

एनुअल मीट के लिए सभी एम्पलॉइस को शहर के सबसे बड़े होटल में पार्टी दी गई थी

और उसी पार्टी में रतन के प्रमोशन का अनाउंसमेंट होना था।

रतन रजनी पार्टी में बहुत अच्छे से तैयार होकर गए थे

लेकिन इस बात से अनजान थे की उसके प्रमोशन का जो अनाउंसमेंट करने वाला है वह कोई और नहीं बल्कि सुशीला है।

रतन और रजनी दोनों बहुत खुश नजर आ रहे थे पार्टी में वह दोनों सबसे अलग ही लग रहे थे।

और अपने दोस्तों से बातें करने में व्यस्त थे तभी अनाउंसमेंट की आवाज आती है।

May I have your attention please. पार्टी में शामिल सभी लोगों का ध्यान उस आवाज की तरफ जाता है।

  धीरज अनाउंसमेंट कर रहा होता है की अब वक्त आ गया है कि आप सब लोगों का नाम बताया जाए जिनका प्रमोशन हुआ है।

और वह नाम मेरी मां और इस कंपनी के ओनर अनाउंस करेंगी और सबको प्रमोशन लेटर देंगी।

सभी बड़ी उत्सुकता से उस तरफ से देखने लगते हैं। तभी सुशीला आती है।

सुशीला बहुत ही सुंदर लग रही होती है। आप सबके ध्यान का केंद्र सुशीला थी।

सुशीला को देखकर रतन के पैरों के तले की जमीन खिसक जाती है।

वह सुशीला को देख कर हैरान हो जाता है और उसे समझ में नहीं आता कि वह क्या करे।

रतन को डर लगता है कि कहीं सुशीला उसका प्रमोशन रोक ना दे।रजनी और सुशीला वहां से जाने की तैयारी करने लगते हैं।

लेकिन उन्हें वहां से जाने के लिए मना कर दिया जाता है।

सुशीला का ध्यान अभी तक रतन और रजनी पर नहीं गया था और वह सभी एंप्लाइज को उनका नाम अनाउंस कर प्रमोशन लेटर देने में व्यस्त थी।

तभी रतन का नाम आता है।   रतन का नाम लेते ही सुशीला लड़खड़ा जाती है फिर खुद को संभालते हुए रतन को बुलाती है और उसका प्रमोशन लेटर देने लगती है।

सुशीला रतन को देख कर ऐसा व्यवहार करती है कि जैसे वह रतन को जानती ही ना हो।

पार्टी खत्म होने के बाद रतन सुशीला के पास जाता है और सुशीला से माफी मांग कर उसे घर वापस चलने के लिए कहता है।

लेकिन सुशीला रतन को पहचानने से इंकार कर देती है और पार्टी से चली जाती है।

घर आकर सुशीला को बहुत रोना आता है धीरज सुशीला की हालत समझ जाता है और सुशीला को संभालता है।

और पूछता है मां आप रतन के साथ क्यों नहीं गई?

सुशीला बोलती है कौन रतन मैं किसी रतन को नहीं जानती।

धीरज कहता है जब आप रतन को नहीं जानती तो फिर आपकी आंखों में आंसू क्यों?

सुशीला कहती है आंख में कचरा चला गया था इसलिए पानी आ गया है आंखों में।

अपने कमरे में चली जाती है।

Written by Anita Dwivedi

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