Poem In Regional Language | Bhojpuri Poem By Akriti Vigya Arpan

Poem In Regional Language | Bhojpuri Poem By Akriti Vigya Arpan

क्षेत्रीय भाषा भोजपुरी

भोजपुरी भारत के उत्तर-पूर्वी राज्यों में बोली सर्वाधिक बोली जाने वाली भाषा है |अपने अंदर छिपी मिठास के कारण भोजपुरी भाषा काफी प्रसिद्ध है | भारत में अनेको कवियों तथा साहित्यकारों ने भोजपुरी भाषा के बारे में अपनी राय दी है | उसी कड़ी को आगे बढ़ाने की एक छोटी सी कोशिश इन कविताओं के माध्यम से की जा रही है |

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कुआर मास विशेष(आश्विन)कवितई

खांड़े पर के जिउतिया

ताग ना हे नेह ह

माई के आशीष हउहे

नेह क ई मेह ह

रे कुआरी ब्यार भीजस

धूप म़े तपि तपि चललि

कादो तौंकत बाटे जियरा

कादो पानी संग गललि

माटी सानत चाक चढ़वत

दिन दी दियरिया ढल रहलि

पित्तरन के नेह बा

जिनगी क पहिया चल रहलि

धान भदई थकि रहलि बा

अब ना रीती खेत में

भल अगहनी अंग सिरजति

धूप के संकेत में

कोहांर के कलशा लहकिहें

मेटिया आ बट्टा ढंग भर

ले बजववा आज हमरे

चुंदरी में रंग भर

नीमिया हिडोला डालि देबें

खोलि देइब मन के पट

हे भवानी बा अगोरा

आसनी बा एहु घट

का कपासी सूत बाती

कातिक बदे सिरजीं भला

मन में दियना पहिले बारीं

देव के फिर दीं भला

बिरह ,प्रेम ,बिरह………निर्गुण।

 

बारह मासा के भाव बिटुरि के

बिंब रचे एक नाम लिखाला

शब्द अघइलें अघइली बरन कुल

काहें अघइली हमें न बुझाला

दीयरी बाती बिन बाती बेतेल

अइसे में दियन कहां जगमगाला

आंखि के लोर लिखीं नैन कोर कि

बिरहिन पहाड़ी के झरना झुराला

कवना भी सीजन धान कुटाई त

भूसी प भूसीय जाके गजाला

गोहूं लगन चाहे पीसीं बरमभोजे

चोकर अंगिया भीतर रहि जाला

मेटिया दो मटका चाहे कंहत्तरि

दही के साढ़ी त ऊपरे सजाला

नेहि क नाता लगल निरमोहिया रे

एक ही रंग चराचर बुझाला

एकही रंग से निकसे बहुरंग

बहुरंग जाके ओही में हेराला

बीया ही भाव दो गांठि भ ऊँखि क

माटीय ऊपर माटी पटाला

पगीके लगीके जागे परान त

पतई क नौका झुरुट उगि जाला

सबहि साध बन्हाइल बा एक से

एक सधइला से सब सधाला

मानुज ते भल मानुज ही हवे

नैन में सुनर सपना सोहाला

सोहत रोपत निरखत ही बल

काल क चक्र चलत चलि जाला

जवना रहल कादो बीया कली फूल

आस अधारे फसल होई जाला

किंचिंत ही बड़भाग सुभाग के

आस सुबास के कलशा पुराला

बाकि निठुर ए भागि के आगि में

कुंदन पहिले त मन भर तपाला

पाला लगे दो बयारि बिछोहिन

पहिला तमाचा तनिक न सहाला

उठत सम्हारत रोअत मनावत

ठीकहि ठाक बखत बिति जाला

कोहूं के भागि फिरो पुरवाई आ

कोहूं के बंजर हिया बसि जाला

कोहूं के बारह रंग फेनो आवे

केहूं के कवनो नागे डंसि जाला

देखत सुनत बूझत जानत

अनुभवे क अधार गढ़ाला

धरम करम मरम के तरे

मोह क ताग परान दुखाला

कहेलें कृष्ण सुजान परान जे

नेह त मोह से ऊपर ले जाला

जुग जनम सव भागि भरत देश

एह धरा पे जो तन मंझाला

आँखि पुतरिया क छईंया निरखि क

नैन परान सभै जुड़ि जाला

नेह क नाता सदा ही अमर बा

पवला बदे ना ई भाव जोराला

राखहुं मंगल सुखी कुशल हे

सृष्टि नियामक मोरा उरवाला

पावस मन के कवनो अमावस

में भी नाहीं नेह दीया बुताला

भूत त भूते  भविष्ये भविष्य ह

साँस क सांचे स लाग मनाला

करत रहल जा न्याय समय से

ईहे असल मे न्याय कहाला

नेह बहावत नेह बसावत

सूतींय चीर नींदे हम बाला।

Poem In Regional Language

मलमास

 

चान के सुजान गति बा

तिथि के घटबढ़ नयन

कई अयन क जोड़ लेहलन

सांच के बा उन्नयन

साँच पर ना आँच आवें

काल का दो घूमि जा

न्याय त होईबे करी

अन्याय केतनो झूमि जा

बज्र खंभा बज्र भीतिया

भलभे से चाहे टूटि जा

प्रहलाद खातिर न्याय होई

चाहें आसन छूटि जा

सत्व भक्ति के मरम

से ही अभय स्थापना

नरसिंह चीरिहें खंभ जब

ई भय करे अवमानना

हर बार के ई सत्य ह

कि स्वीकृति नाहीं सहज

बाकिय देखीं पंक में ही

उग सके सुंदर जलज

हो संसार में अवहेलना

ठाकुर के घर में नेह बा

तबहीं त चिकनी ,लोम बा

तबहीं त बालू ,रेह बा

मलमास के कहिके सुघर

ठाकुर दिहीं संदेश हे

सब प्रेम के भागी हवन

बेकाज क ह क्लेश हे

तन के थाका लागि जा त

मन के मांजे के बखत ह

चान जोड़े तीथि उधारी

तीन बरखा पर नखत ह

मलमास क सुआस ई

मन में भरे उजास ई

ध्यानि धावें जोगी जोगें

ह करम क क्लास ई।

 

मैं नि:शब्द हूँ।

 

शब्दों के बांण सघन हो चले थे और अब बारी मौन की थी।

मौन के दामन में इतने अधिक शब्द थे कि मौन ने कहा …..”मैं नि:शब्द हूँ।”

धनवान मौन का धरातल पर बिछता स्वरूप देख ऊँचे ओहदे का दावा करने वाले चिल्लाते शब्द दिखावा तो यही कर रहे थे कि सब कुछ सामान्य है लेकिन वास्तविकता यह थी कि ग्लानि ने कभी इस तरह आइना बनकर उनको इससे पहले ऐसी चुनौती नहीं दी थी।

जो चेहरे अब तक तनाव में थे वह सब मुस्कुरा रहे थे ,विजय पराजय की सारी बातें हवा में घुल चुकी थीं और मौन का मुस्कुराना इस बात को लेकर था कि ” बस थोड़ी देर तक ……फिर वही शब्द बांण…..हे प्रभु!”

“मौन साधना है और मौन का मतलब चुप हो जाना कतई नहीं, सत्य के विजय हेतु मौन ने स्वयं मार्ग से हटने के निर्णय लेती रही लेकिन मौन का समर्थन कुतर्क को कभी नहीं रहा।”

यही तो उस दिन मौन ने वापस आकर कहा था , चीत्कार से अनुभूति इतना कहते कहते शांत हो गयी क्योंकि नियति के आने का समय हो चला था और अब बारी उस समय की थी जब नियति का मौनव्रत के पारण का समय था और श्रोता बनने का सौभाग्य चीत्कार और अनुभूति के हिस्से में था।

– Akriti Vigya Arpan

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