Best Hindi Poems-Hindi kavitaye

Best Hindi Poems-Hindi kavitaye | Collection Of Hindi Poems |

Best Hindi Poems-Hindi kavitaye | Collection Of Hindi Poems |

यादों के पन्ने

Best Hindi Poems-Hindi kavitaye

आज कुछ पन्ने पलट रही हूँ ,
जरा फुर्सत से बैठी हूँ,
अपने एकांत मन को भावनाओं में बहने से रोक रही हूँ ,
ख़ुदग़र्ज़ हूँ जरा , इन पन्नों को सबसे छुपाए मैं यादों की कश्ती में बह रही हूँ ।
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कुछ लम्हों से ऐसा नाता था,
मेरे मन को बस वहीं भाता था,
नहीं किताब मत कहिए ,ये तो बस कुछ पन्ने हैं,
कुछ अनकहे लम्हें हैं,
दिल का दरवाज़ा हैं ,
बेफ़िक्री से खोला हैं,
उदासी के बोझ ने आज फिर कुछ बोला हैं।
लोग मिलते हैं, बिछड़ते हैं‌,
जितना सफ़र हो वो पूरा करते हैं,
कुछ दिल में कैद हो जाते हैं तो,
कुछ को हम भुला नहीं पाते हैं।
मगर पन्नों से उनके निशान कहाँ जाते  हैं,
दर्द की ऐसी स्याही से लिखा जाता हैं,
अश्कों का सैलाब भी नहीं मिटा पाता हैं,
बड़ी खुदगर्ज होती है ये यादें,
तुम्हारे दिल में अपना घर बनाती हैं ,फिर  कुछ अरमानों को सजाती हैं,
बेवक्त ये तुम्हे रुला देती  हैं ,फिर ना भूलने की  वजह  देती हैं ,
ये तो उस शहर में रहती है जहाँ लोग इससे मिलने हर रोज़ जाते हैं,
मेहमानवाजी भी इनकी जरा खास हैं,
मेरे टूटे दिल की  एक आस हैं,
मैं मिल आती हूँ अपनों से,
जिन्हे रोज़ तलाशती  हूँ  उन पन्नों में,
बेहद करीब से देखती हूँ जब उन यादों को,
ना पूरे हो पाए उन वादों को,
ना मुड़ पाऊं उन राहों को,
ना पूरी हुई उन ख्वाहिशों को ,
तो उन पन्नों को कह देती हूँ,
लौट आओ एक बार,
अधूरी है कुछ बात ,
मत लड़ो मुझसे ,चाहे दे दो फिर मात।
मुझे उन यादों को फिर से जीना हैं,
तू इजाज़त दे तो वो सफ़र तय करना हैं,
रूठे मेरे अरमानों को तुझसे कुछ कहना हैं,
बस एक बार पलट के मुझे वक़्त के साथ चलना हैं।
गुरूर इनका जायज़ हैं,
यादों की भी कुछ रिवायत हैं,
ये ना मिट सकती है ,ना मिटा सकती हैं,
यादों के पन्ने कहां कुछ कहती हैं,
जो बदल ही पाती ये अपने नसीब का लिखा,
तो मनुष्य ने जिंदगी में कुछ नहीं सीखा।
सुनिए वो क्या कहता हैं,
मैं यादों का पन्ना हूँ,
तुम जो लिख देते हो, वो अब यादें हैं,
मैं मिटा नहीं सकता, ये मेरे दृढ़ इरादें हैं।

यकीन

मैं वक़्त पे वक़्त ले रही थी,
एक कदम बढ़ाने से भी ना जाने क्यों डर रहीं थी,
कुछ था जो सहमा सा था, मन जरा उलझा सा था,
अब संदेह ख़ुद पे ही हो रहा था, मेरा दिल एक वहम पिरो रहा था,
बहुत रंजिशे हुई ये जानकर ,मैं हो गई थी विहीन, कोई बता देता ,
तो मैं समझ पाती ,फीर कैसे करू यकीन, कुछ टूट गया था
,बिना शोर हुए, अरमानों के फीर ,सौ ढेर हुए,
समेटना अब जरा मुश्किल था, तिनका-तिनका मेरा बिखरा था,
चेहरों पर अब यकीन नहीं था, जुर्म किसी का संगीन बहुत था,
औकात की बात कर के , अपना रंग दिखा गया था,
ज़मीर अपना बेच, झूठ पर्दे से ढक रहा था, बहुत विचारों के बाद हिम्मत से पूछा,
क्या साथ दोगी मेरा? ज़ुल्म तो अपनों ने ही किए हैं, पर अब वो अपने नहीं लगते,
कितना और हम भला भटकते, टूटे यकीन तो जुड़ते नहीं हैं, मेरे क़दम भी बढ़ गए ,
अब मुड़ते नहीं हैं, सफ़र बदल अब जिंदगी से कह रही हूँ , जब यकीन नहीं रहा ,
तो क्यों मैं लड़ रही हूँ , सुकून तो अब अपने अस्तित्व से हैं,
जिसे रोज़ सुबह मैं आयीने देख रही हूँ ,

वक़्त से मजबुर

Best Hindi Poems-Hindi kavitaye

वक़्त से मजबुर , अपने आप से दूर होकर मैं जब भी कुछ लिखती हूं,
लोग उसे मेरी कहानी समझ लेते हैं।
ख़ामोश मेरी नजरें जब कुछ ना कह पाती हैं,
तो उसे मेरी तनहाई का नाम दे देते हैं।
कुछ मुझे सवालों से घेर लेते हैं ,
तो कुछ के लिए मैं सवाल बन जाती हूं।
दास्तान-ए-ज़िंदगी में, मैं अपने आप से सवाल पूछती हूं,
बेवक्त इन आंखो में आंसू रहते है और बिन मतलब के हंसी,
हर सुबह ख़ुद में अपने आप को तलाश करती हूं।
झूठ का पर्दा सच की रोशनी को नहीं छुपा सकता,
एक हक़ीक़त ही है सब जिसे कोई नहीं बदल सकता ,
वक़्त से मजबुर अपने आप से दूर होकर मैं जब भी कुछ लिखती हूं ,
लोग उसे मेरी कहानी समझ लेते हैं।

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मन

क्या करू मैं इसका ये मेरी भी नहीं सुनता है
पागल थोड़ा ज्यादा है मुझ पे ही बिगड़ता है
अल्हड़ सा है कभी तो कभी चंचल हो जाता है
देखो ना कैसे अपनी ही सोच में खो जाता है बुद्धू सा है कभी ,
तो कभी स्याना भी बन जाता है मुझसे अपने सारे काम करवा ख़ुद सुकून से बैठ जाता है
कभी शांत तो कभी एक दम वीरान हो जाता है
कैसे कहूं मैं मुझसे भी अंजान हो जाता है जिद्दी भी है
जरा थोड़ा नादान है करे कुछ नहीं बस मुझे परेशान है
बड़ी-बड़ी बाते करता है कभी तो कभी मुझे राह दिखाता है
बस यही तो है वो जो मुझे सुनता और समझाता है
एक पल जो ना मुझे छोड़े भला अब ये रिश्ता भी कैसे तोड़े मेरा तो यही सब-कुछ है
यही है जीवन तुझसे तो ज़िंदगी भर का नाता है मेरा मन

मासूम

कहाँ है आज जज़्बात लोगों के क्यों वो अपनी ही धुन में रहते हैं
देख किसी मासूम को नजर भी फिर लेते हैं
तुम दावते करते हो ,नए कपड़ों से अलमारी भरते हों गाड़ियों में घूमते हों,
महलों को सजाते हों पर इंसानियत का मर्म भी नहीं जानतें
क्यों एक मासूम को इंसान नहीं समझते
धूल में लिपटे उसके कपड़े ,
आंखो में लिए वो उम्मीदे तेरे दर पे
आकर जब वो खड़ा होता हैं
मन उसका भी अंदर से रोता हैं दर्द की एक तस्वीर है
जिसका जीवन क्यों तुझे होती है उस से चुभन
कभी तो दया का भाव लाया करो
उसके ज़ख्म पर भी मलहम लगाया करो
तुम अपने हिस्से से थोड़ा उसको भी दे दो भूख उसे भी लगती है
पेट उसका भी भर दो वो कैसे कहें दुनिया से,
लोगों तक उसकी आवाज़ पहुंचती नहीं हैं
है इतना गुरूर खुदा के बन्दों में ,
उस मासूम पे दया उन्हें आती नहीं हैं

इंसानियत

मत करो इंसानियत को इतना शर्मसार,
की मैं कह ना पाऊं तुम हो इंसान,
माटी के पुतले हम एक दिन माटी में मिल जाएंगे,
क्या करोगे नफ़रत करके ,
एक दिन सब राख हो जाएंगे।
हर चेहरे ने मुखौटा पहना हैं, बोलों अब क्या कहना हैं,
ना भावना हैं ,ना संवेदना हैं, मनुष्य को बस हर हाल में आगे बढ़ना हैं,
दो पल किसी की सुनते नहीं , निंदा तुम कितनी करते हो,
देख किसी को आगे बढ़, तुम साजिशों का खेल रचते हो,
मत करो इंसानियत को इतना शर्मसार,
की मैं कह ना पाऊं तुम हो इंसान।
यहां तो भावनाओं का मोल नहीं, मीठे तुम बोलते बोल नहीं,
तेरी बेरुखी से दिल है आघात, मार के इंसानियत ,
तुम करते हो बात, रुक जाओ अब,
मत चलाओ इतना शब्दों का बान,
की मैं कह ना पाऊं तुम हो इंसान।
दम घुटता है मेरा ,जानके तेरा विचार,
क्यों तू मुझे अपना बोले हैं, मेरे मन में ज़हर घोले हैं,
एक तेरी हरकतों की मैं हों रही शिकार,
मत करो मूझपे इतने जूल्म, की हार के कर दूं ख़ुद को लहू-लुहान,
थम जाओ अब मत करो और एहसान,
की मैं कह ना पाऊं तुम हो इंसान।
मोमबत्तियां तुम कितनी जलाते हों, फिर दो मिनट का मौन रखते हों,
जीतेजी तुम कभी हाल नहीं पूछते हों,
और कोई मर जाए तो सवाल उठाते हों, क्या मानवता की ये पहचान हैं?
बनना तुमको सिर्फ महान हैं, अब भी वक़्त है रुक जाओ,
मनुष्य होने का कुछ तो फ़र्ज़ निभाओ,
मत करो इंसानियत को इतना शर्मसार,
की मैं कह ना पाऊं तुम हो इंसान।

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रिश्तों के हिसाब

हर रिश्ते को दौलत ने बांटा है
तभी ऊंचे महलों में भी सन्नाटा है
सजावट की एक दुकान है
ये घर नहीं मकान है
यहां हर रिश्ते को तौला जाता है
तभी ऊंचे महलों में भी सन्नाटा है
कीमत भी क्या लगाई जाती है
अपनों से ही रुसवाई होती है
दिखावे का बाज़ार होता है
इन्हे कहां अपनों से प्यार होता है
चेहरों पे मुखौटा और दिल में नफरत का पैगाम होता है
यहां तो पाई पाई के लिए कत्लेआम होता है
हर रिश्ते को दौलत ने बांटा है
तभी ऊंचे महलों में भी सन्नाटा है

ना जाने क्यों

ना जाने क्यों लोग इतना सवाल करते हैं
देख मुझे परेशान ये ठंडी आहें भरते हैं
मुझे नाकाम और नाकामयाब कहते हैं
ये लोग क्यों इतना सवाल करते हैं
अरे थम भी जाओ रुको जरा बैठो दो पल तुम कितने हिसाब करते हो
बढ़ा के मेरा दर्द बातें लाज़वाब करते हो
ना जाने क्यों लोग इतना सवाल करते हैं
तुम समझो मुझे मैं आशा नहीं रखती पर तुम्हारे सवालों से हर रोज हूं बिखरती
हां मैं तेरी सुनती हूं जख्म गहरे दिए हैं तूने पर हिम्मत की दवा रखती हूं
तू चाहे जितने दर्द दे मैं कहां बिगड़ती हूं
ना जाने क्यों लोग इतना सवाल करते हैं

बचपन

1

उंगली पकड़ जब चलते थे
मासूम से हम बच्चे थे
कागज़ की कश्ती बना बारिश में झुमा करते थे
गुड्डे-गुड़ियों का ब्याह रचा हम तब कितनी नादानी करते थे
चुरा के आम हमने भी तोड़े थे
बिन हिसाब किए कितने रिश्ते जोड़े थे
पापा के कंधे पे बैठ ना जाने कितने मेले देखे थे
हम अपने ही धुन में बिल्कुल अलबेले थे
रिपोर्ट कार्ड आए तो हम सहम जाते थे
पड़ेगी डांट ये सोचकर थरथराते थे
मां के हाथ से खाकर पेट भर जाता था
कहानियां सुन मैं दादी मां से कितना इतराता था
तब गणित में जोड़ घटाव करता था
भाग कर तितलियों को पकड़ता था
जिंदगी की हकीकत मैं कहां जानता था
क्युंकी तब मैं एक मासूम सा बच्चा था
झूठ और फरेब क्या होता है
मैं तो अल्हड़ सा पागल था
पकड़ के चलता मां का आंचल था
गिल्ली डंडा और छुपन छुपाई खेल खेल में हो गई लड़ाई
जब कोई शिकायत लगाने आ जाए मां मेरी गलती नहीं है
कह मैं तान के सो जाता था
रजाई तब ना हम छुप कर रोते थे
ना मन में कोई द्वेष रखते थे
क्युंकी तब हम मासूम से बच्चे थे

मेरा परिचय

मैं वो कहानी नहीं जिसे तुम पढ़कर समझ जाओगे
हर पन्ना कुछ सवाल तेरे ज़हन में छोड़ जाएगा
मैं वो पहेली नहीं जिसे तुम सुलझा पाओगे
यक़ीन मानों तुम खुद उलझ जाओगे
मैं वो सफ़र नहीं जिसकी मंजिल तुम पा जाओगे
मैं वो रास्ता हूं जिसे तुम खत्म ना कर पाओगे
मैं वो शहर नहीं जिसमें तुम अपना घर बनाओगे
मेरा कोई ठिकाना नहीं बताओ अब कहां ले जाओगे
मैं वो एहसास नहीं जिसे तुम समझ पाओगे
मेरे बिखरे अल्फाज़ तुम जोड़ नहीं पाओगे
है अस्तित्व परिपूर्ण मेरा तो क्या वजह बन कर आओगे
मैं अधूरी नहीं तो मुझे कैसे पूरा कर पाओगे

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मुस्कान

मैं तेरे चेहरे की मुस्कान हूँ जब तुम खुश होती हों
मैं खिलखिला उठती हूँ तेरे चेहरे पे श्रृंगार की तरह सजती हूँ
मैं तेरे दिल की गहराइयों तक जा तुझे जान लेती हूँ
और फिर तेरे होठों को छू मुस्कुरा देती हूँ
मैं जानती हूँ तुम मेरा सामना सबसे नहीं करवाती
जो तेरे अपने ना हों तो कभी कभी ही मिलवाती
मैं तो तेरे कहने से ही चलती हूँ
जो तू एक इशारा भी कर दें तो मैं एक कदम भी ना आगे बढ़ती हूँ
पर जब तुम मुझे दिल से पुकारती हों
मैं हौले-हौले तेरे होठों को छू मुस्कुरा देती हूँ
कभी-कभी मैं बेवक्त आ जाती हूँ
जब तुम धुंधली यादों में खो जाती हों
मैं भी उन पलों की हिस्सा थी कभी गवाह बन जाती हूँ
तेरे होठों पर आ तभी मैं ख़ामोश हों जाती हूँ
जब तेरी आंखें नम हो जाती हैं
मुझे फ़िक्र होती है तेरी पर तुम्हारी आवाज़ सुनने तक का इंतजार करती हूँ
मैं गुलाम हूँ तेरी जब तू आदेश देती है मैं हुक्म का पालन कर मुस्कुरा देती हूँ

अधूरा

कहानी ये पूरी ना हुई
ना जाने कितने ख्वाब देखें
ताश के पत्तों सा बिखर गया
सब आख़िरी लम्हा भी अधूरा ही रहा
ना तुमने कुछ सुना ना
मैंने कुछ कहा ख़ामोशियों की ना जाने क्या बातें हुई
मैं आंसुओ में सिमट गई
तुम नफ़रत से कह गए वजूद इस रिश्ते का ख़ुद ही मिटा गए

ज़र्रा-ज़र्रा

ज़र्रा-ज़र्रा बदल लिया
जब जीने का सबब मिला
वक़्त की रंजिशों से कह दिया
बना मुझे मुंतज़िर ना
अब ख़लल बढ़ा बेतहाशा चाह नहीं है
मेरी बस ज़ुस्तज़ू खुद को पाने की हैं
मुकम्मल अपना सफ़र बनाने की हैं

आहट

रुक सी गई है
ज़िंदगी शायद किसी ख़ोज में जुटीं है
वक़्त का पहिया घुमा ही नहीं
ना जाने क्यूं पर कोई बात हुई है
बहुत सन्नाटा है दिल में
कोई चला गया है
एक आहट ना हुई आने की
फिर भी दरवाज़े पर निगाहें बेपरवाह टिकी है

ज़मीं पे सितारा

मैं आसमाँ का नहीं ज़मीं पे एक सितारा बनना चाहतीं हूँ
मेरी कलम चलें जब तो हर एहसास का अफ़साना लिखना चाहतीं हूँ
कोशिश एक बार नहीं बार-बार करना चाहतीं हूँ
मैं दिल की बातें दिल तक पहुँचाना चाहतीं हूँ
मैं आसमाँ का नहीं ज़मीं पे एक सितारा बनना चाहतीं हूँ
मैं चमकना नहीं बस अंधेरे को मिटाना चाहती हूँ
दो पल ज़िंदगी से लोगों को मिलवाना चाहतीं हूँ
भ्रम नहीं है कुछ अनमोल हैं
हर क्षण मैं कोशिश की कहानी का हर पहलू बताना चाहतीं हूँ
रूठे हुए को हंसने का सबब देना चाहतीं हूँ
मैं मायूसी की दुनिया में लोगों को उनके वजूद की अहमियत बताना चाहतीं हूँ
मैं आसमाँ का नहीं ज़मीं पे एक सितारा बनना चाहतीं हूँ

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क़फ़न

तू हार नहीं सकती ज़िंदगी ,
तेरा सफ़र अभी बाकी हैं,
कोयले से हीरा बनने का तू ख़ुद बैसाखी हैं,
क्यों बेबस कर रहा है ख़ुद को इतना,
अभी हर जूल्म का इंसाफ़ बाकी हैं।
जो तू टूट जाएगा ,तो मैं जोड़ नहीं पाऊंगी,
उन रास्तों को फिर मोड़ नहीं पाऊंगी,
मत कर ख़ुद को ज़िंदगी से बेदख़ल,
की तेरी ताबूत पे लोग बना लेंगे अपना महल।
मौत से भयानक तो कोई चीज़ नहीं होती,
हम ज़िंदगी से हार जाएं ये रीत नहीं होती,
क़फ़न क्यों तुम लगा रहें हों,
ना लौट पाओगे कभी जहां जा रहे हों,
क्या समेट लोगे हर लम्हे को? कह दोगे अलविदा अपनों को?
रोज़ सुबह दुआओं में तेरा नाम लेती हैं,
हर दिन तेरी राह निहारे तेरी मां भी रोती हैं,
बिना बाप को कांधा दिए, तू कैसे चला जाएगा,
जो चला गया तू ,तो कभी लौट नहीं पाएगा।
माना लोगों ने बड़े जूल्म किए ,
फिर निराशा ने तुझे घेर लिया,
तेरे दिल में एक सैलाब उठा,
तू मौत से मिलने को बेताब हुआ।
क्यों तुझे इतनी निराशा हैं?
ना मन में कोई अभिलाषा हैं,
मत दें ख़ुद को तू सजा, की फीर लोग ढूंढेंगे वजह,
बस एक बार थामले तू जिंदगी का हाथ,
उम्र भर ना छूटे ऐसा हों साथ,
आ अब चल दें तू बिना लड़खड़ाए,
की तेरी इंसाफ की लड़ाई अभी बाकी हैं,
रचने को एक नया इतिहास स्याही अभी बाकी हैं।

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बोलों ना

जो हाल ना बयान कर पाऊं कभी तो आंखो में वज़ह ढूंढ़ पाओगे
बोलों ना क्या अपनी नज़रों से मेरी निगाहों तक का सफ़र कर पाओगे
मेरे सिसकते होंठ कभी शब्दों तक ना पहुंच पाए तो दिल से वो आवाज़ सुन पाओगे
बोलों ना जो मैं कह ना पाई क्या तुम समझ जाओगे
हालातों से कभी टूट जाऊं या तुमसे कभी रूठ जाऊं
ना हो वज़ह मुस्कुराने की भी
बोलों ना क्या मेरे हंसने की वज़ह बन पाओगे
खुद को कभी तुमसे दूर कर दूं या तुम्हे किसी और का होने को कह दूं
क्या बात मान जाओगे बोलों ना क्या मिलने मुझे वापस नहीं आओगे
क्या मेरे दिए हर तोहफ़े को संभाल पाओगे
इस रिश्ते का वजूद मरते दम तक निभाओगे
मेरी छोटी से छोटी खुशी की वज़ह बन पाओगे
बोलो ना कभी छोड़ के नहीं जाओगे
मेरे आंसुओ को जो तुम अनमोल कहते हों
मैं रोऊं कभी तो तुम भी पलके भीगा लेते हों
बोलो ना क्या सच में तुम मुझे मुझसे भी ज्यादा जानतें हों
वादे जो तुम हजार कर रहे हो क्या निभा पाओगे
हमारे सपनों का जो घर बना रहें हो
क्या मुझे वहां ले जाओगे
बोलों ना पूरी जिंदगी का सफ़र मेरा हाथ थामे कर पाओगे

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यादों की एलबम

1

कुछ कैद तस्वीरों में हम अपने आप को ढूंढ़ते हैं
अक्सर उन यादों को फिर से जीना चाहते हैं
ये वो पल हैं जिन्हें संजोने में पूरी उमर गुज़र जाती हैं
और याद करते ही आंखें नम हो जाती हैं
यादें ना जाने कितने लम्हों को समेट कर रखती हैं
ख़ामोश तस्वीरें भी कुछ कहती हैं
बहुत आसान होता हैं इन यादों को कैद करना पर कहां संभव है
इन्हें फिर से दोहराना कोशिश करिए कि कैद की हुई
हर तस्वीर एक सुनहरी यादों की गवाह बने
देख उन्हें आपके चेहरे की मुस्कान बेपरवाह रहें
हर तस्वीर आपकी ज़िंदगी की कहानी हों
यादों की एलबम उनके अस्तित्व की निशानी हों

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मुकम्मल

लफ़्ज़ ख़ामोश है वक़्त की आगोश में
जिंदगी बेकदर सी है
तू क्यों रूठा है खुद से बन्दे जब शोर पूरे शहर में है
घोर अभिलाषा का समुंदर आसमान में आफ़ताब को देखे
तू बेखबर अपनी राह में किस ख्वाहिश की तलब करें
बेहिसाब इम्तेहान दिए बेसब्र हर आरज़ू को पूरा करने तू
क्यों ना कोशिश हर पल करें
चलो उठो एक साथ ये निर्णय करे
जिंदगी की कहानी को बिना रुके मुकम्मल करें
बेफ़िक्री का हर लम्हा बीते वक़्त चाहे कम भी हो जीतने का जोश रहें
उम्मीदों का एक शहर भी हो हर तूफ़ान से हम साथ लड़े
ना डरें ना मुड़े कर होंसलो को बुलंद यूहीं
चलों उठो एक साथ ये निर्णय करें
ज़िंदगी की कहानी को बिना रुके मुकम्मल करें
तू कोशिश कर हिसाब नहीं वक़्त की कोई क़िताब नहीं
हर लम्हा हमको जीना हैं कुछ गम के आंसू पीना हैं
क्यों हम इतना डरते हैं कभी जुड़ते कभी बिखरते हैं
ज़िंदगी का कुछ तो मोल समझो चलों उठो
आज फिर कह दो आओ सब मिल के ये निर्णय करें
ज़िंदगी की कहानी को बिना रुके मुकम्मल करें

ग़रीब

सर पे छत नहीं ,सोने को बिस्तर नहीं ,
पैरों में चप्पल नहीं ,पहनने को वस्त्र नहीं,
खाने को रोटी नहीं ,लड़ने को अस्त्र नहीं,
हां मैं गरीब हूं ,वो गरीब जिसकी कोई सुनता नहीं।
आंखो में सपने नहीं, लोग यहां अपने नहीं,
वजूद हमारा हम से नहीं,
दर्द अब बयान करने की हिममत नहीं,
हाथो में लकीर नहीं ,
क़िस्मत का फ़कीर नहीं,
रोज जंग है तो पेट भरने की ,
पर कोई दे वो वज़ीर नहीं।
फुटपाथ मेरा आशियाना है,
मेरी झोपड़ी का ना कोई ठिकाना है,
कांच के बर्तन हमने देखे नहीं,
प्यालों में चाय कभी पिया नहीं।
जिस दिन रोटी मिले वो त्योहार है,
पीकर पानी भी हमने कहा उसे आहार है,
एक गरीब होना तो सृष्टि पे भार है,
लोगों से कभी ना मिला हमें आभार है।
सर्दी गर्मी मौसम के परे,
हमने बिता दी जिंदगी धरती की आंचल तले,
लोगों ने मनाई जब होली, हमसे तो कोई रंग ना बोली,
दिए जब तुमने जलाए, गरीब के आंसू छलक आए।
मंदिरों के दरवाज़े ही बस हमने देखें,
बैठ चौंखट पर हाथ फैलाए, अमीरों ने बड़े भेंट चढ़ाएं, ना,
नजर दया की नहीं , नाम कमाने से मतलब है,
सुबह अखबारों में पढ़ना है,
ये ही तो उनका करतब है।
दाने दाने को तरसे हम,
ये कुर्सियों और मेज पे खाए,
बेहिसाब फिर शोहरत की,
फेक खाना ये अकड़ दिखाएं,
हमने तो सुखी रोटी का ही दावत खाया,
बिना पेट भरे भी रातों को बिताया।
सितारों की जगमग से भी अंधेरा है,
मिला नहीं किसी गरीब को बसेरा है,
दर दर की ठोकर उसका जीवन हैं,
जिंदगी को कैसे देखे उसके पास तो ना दर्पण है।
एक गरीब जब चीखें चिल्लाएं,
दर्द से भरे अपने लहू बहाएं ,
वो भी मिट्टी से बना तू भी मिट्टी का ही है,
देख उसका भी हाल कभी,
तू क्यों ना मदद को हाथ बढ़ाएं।
कब तक लाश बने रहोगें,
सुन आवाज़ भी डटे रहोगें,
आंसू पोछ दो उसके भी ,
मत करो उस से घृणा,
जाओ कभी जाकर देखो तुम उसका नसीब,
मत कहो तुम उसे गरीब।

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डायरी के पन्ने

डायरी के कुछ पन्ने पलट रही थीं
रंगीन स्याही से लिखी बातें दिखी
मन उस राह पर चला गया जो कहीं पीछे छोड़ आई थी
मैं फिर दिल भी कहने लगा कुछ देर रुक जाओ
अनगिनत यादों का सफ़र पूरा तो हो जाए
अभी तो सिर्फ़ एक पन्ना ही पढ़ा है
थोड़ा सोच में डूबी मैं पर कहां आज उंगलियां रुकने वाली थी
बैठी थोड़ी मैं भी खाली-खाली थी कुछ दूर तक जब पहुंची
तो समझ आया की अधूरे सपनों को पीछे छोड़
कुछ मतलबी रिश्तों को तोड़ मैं आज बहुत दूर आ गई हूं
नम आंखे बस उन पन्नों को ही ताके जा रही थी
डायरी के पन्ने आज अपनी कहानी बता रही थीं

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देशप्रेम

ऐ वतन मेरे इक तेरी ज़मीं पे जीना चाहती हूँ,
बेइंतेहा मोहब्बत है तुझसे, तेरे इश्क़ में कुर्बान होना चाहती हूँ,
तू जब दुल्हन बने, मैं तुझे सजाना चाहती हूँ,
इक तेरी आन के खातिर मैं मिट जाना चाहती हूँ,
हरियाली की चादर ओढ़ा मैं फसलों को बोना चाहती हूँ,
तेरा हक है तू बंजर भी रहे पर मैं तुझे उम्मीदों से भरना चाहती हूँ,
बेइंतेहा मोहब्बत है तुझसे,
तेरे इश्क़ में कुर्बान होना चाहती हूँ।
दीवाली में दीप जला तुझे रोशन करना चाहती हूँ,
होली के रंगों से फिर तुझे रंग देना चाहती हूँ,
ईद में तुझे गले लगा अपना बनाना चाहती हूँ,
बैसाखी में भांगड़ा पा तेरे संग झूमना चाहती हूँ,
बेइंतेहा मोहब्बत है तुझसे,
तेरे इश्क़ में कुर्बान होना चाहती हूँ।
तुझे चांद तक पहुंचाने का अभिमान रखना चाहती हूँ,
तेरे आत्मनिर्भर के सपने को अब हर हाल में पूरा करना चाहती हूँ,
ना तू रुके ना मैं रुकु ,हम मिलकर कदम बढ़ाएंगे,
हों मुश्किलें हज़ार हम सब पार कर जाएंगे,
मैं तेरे स्वाभिमान की वज़ह बनना चाहती हूँ,
बेइंतेहा मोहब्बत है तुझसे,
तेरे इश्क़ में कुर्बान होना चाहती हूँ।
दुश्मनों की निगाहों से तुझे महफूज़ रखना चाहती हूँ,
तू महबूब है मेरा , तेरी हिफाज़त के लिए मैं सर भी कटा सकती हूँ,
मेरी मोहब्बत पे कभी सवाल ना करना, इक तेरे लिए मैं जीती हूँ,
ए वतन मेरे मैं तुझे बड़ी शिद्दत से मोहब्बत करतीं हूँ,
मैं अपना सबकुछ इक तुझे पे न्योछावर करना चाहतीं हूँ,
बेइंतेहा मोहब्बत है तुझसे,
तेरे इश्क़ में कुर्बान होना चाहती हूँ।

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कागज़ और कलम

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जरा सोचिए कागज़ और कलम का रिश्ता कितना खास है
एक जज़्बात लिखता है और दूसरा उसे संभाल के रखता है
एक एहसास को रूप देता है तो दूसरा उसे बयान करता है
एक उम्मीद देता है और दूसरा उसको बिखरने से बचाता है
शायद कागज़ और क़लम की यही नियति है
इनके अलग होने की मुझे तो कोई वज़ह नहीं दिखती है
इसलिए कहती हूं कागज़ और क़लम का रिश्ता बहुत खास है
एक जज़्बात लिखता है और दूसरा उसे संभाल के रखता है

कोरोना के बाद ज़िंदगी की कल्पना

आज फिर एक सुबह हुई,
सूरज की रोशनी को हमने बड़ी गोर से देखा,
चेहरों पर मुस्कुराहट और आंखो में नमी थी,
आज डर नहीं था जिंदगी को हार जाने का,
ये तो एक ओर मौका था हर रिश्ते को निभाने का,
हा आज़ाद है हम अब उस पंछी की तरह
जो खुले आसमान में उड़ान भरता है,
ओर थक जाए तो अपने आशिया की ओर बढ़ता है।
सूनी सड़के अब सूनी ना रही ,
सभी दुकानें आज फिर है खुली,
मेरा किसान फसल बोने को है चला ,
उसके माथे पे कोई डर बचा नहीं,
मेरे देश का भविष्य आज स्कूल ओर कॉलेज में है,
सारे इम्तेहान इन्हे देने है अब ओर कोई विलंब नहीं।
मोहल्ले में आज फिर चाय पे चर्चा चल रही है,
बुजुर्गो की अपनी अलग महफ़िल सजी है,
कोन हिंदू ओर कोन मुसलमां ,
ये खुशी के गीत एक साथ गा रहे है।
भटक रहे थे जो लोग दो वक़्त की रोटी के लिए,
आज मिला है काम वो चल दिए सभी,
जिस मां की आंखें तरस गई थी अपने बच्चो के लिए,
आज चली है रेलगाड़ी उन्हें पहुंचाने के लिए,
कुछ रिश्तों ने गीले शिकवे मिटा दिए,
जब लोग एकांत हुए थे
तो हर गलती को समझ गए।
मन में आस्था लिए आज चले है
भक्त भगवान से मिलने,
कुछ मंदिर ,कुछ दरगाह तो कुछ गुरुद्वारे,
अपने खुदा का शुक्रिया आज हर कोई कर रहा,
जान है तो जहान है
लोग भली भांति समझ गए,
कुछ लोगों ने अपनो को खो दिया,
वक़्त का वो कहर था चलो आज टल गया।
आज हम लोगो से दूर नहीं भागते थे,
दोस्तो से मिलना एक अरसे बाद हुआ,
कहीं पिज़्ज़ा पार्टी चल रही थी
तो कहीं सिनेमा की टिकटें बुक हुई,
रुकी हुई शादियों की तारीखे तय हुई,
खोई हुई कुछ उम्मीदें फिर वापस मिली।
आज डॉक्टर्स ओर नर्स भी अपने घरों में है,
अपनो के साथ, कैसे शुक्रिया अदा करे
इनके आज ओर शब्द नहीं,
उन सिपाहियों को सलाम तो पूरा देश कर रहा,
जो धूप ओर गरमी में भी हर वक़्त खड़ा रहा।
ये जिंदगी की लड़ाई थी , हम कहा चैन से सोते थे,
देख अपने लोगो का दर्द , हम घरों में बैठे रोते थे।
कोरोना की महामारी की ये अदभुत कहानी है,
जिसे याद करते वक़्त भी लोगो की आंखो में पानी है,
अंधेरे से रोशनी तक का सफ़र हमने तय कर लिया,
ओर आज फिर एक सुबह हुई,
हा यही तो सच है आज फिर एक सुबह हुई।

Best Hindi Poems-Hindi kavitaye

अधूरी मोहब्बत

मत रोको आज खुद को इन अश्कों का बहना जरूरी है
भिंग जाने दो पलको को जब मोहब्बत ही अधूरी हैं
लोग अपना कहके हज़ार वादे कर जाते हैं
वो मोहब्बत का हक कहां अदा कर पाते हैं
अलग हो जाते हैं रास्ते मंजिले बदल जाती हैं
शायद मोहब्बत की यही सजा होती हैं
दो दिल ख़ामोश हो जाते हैं आंखें नम रह जाती हैं
फिर कहां ये कहानी पूरी हो पाती हैं
मत रोको आज खुदको इन अश्कों का बहना जरूरी है
भींग जाने दो पलकों को जब मोहब्बत ही अधूरी है

सावन

अब के सावन जो तू आया है,
दिल में उम्मीदों के रंग लाया है,
ये मौसम ये बारिश,
है तुझसे एक सिफ़ारिश,
जा पहुंचा दे संदेशा मेरे मीत को,
मौसम मिलने का हमारा आया है,
अब के जो आएंगे वो,
तो ना जाने दूंगी उनको,
है राम वो मेरे,
मैंने उनकी सिया कह दिया है ख़ुद को।
अब के सावन जो तू आया है,
मेरे चेहरे पे हंसी लाया है,
है उनसे मिलने की ख्वाहिश,
पर करती हूं एक गुज़ारिश,
ये संदेशा उनको दे देना,
हूं राह निहारे इंतेज़ार में,
जा बरस उनके शहर आज ,
मेरे दिल का हाल उन्हें कह देना।

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वो शख़्स

हां वो लम्हा मेरी ज़िंदगी में भी एक बार आया था
जब क़िस्मत ने मुझे उस शख़्स से मिलवाया था
दिन और तारीख़ तो मुझे याद नहीं
पर भीड़ में उसका मेरे करीब होना
तभी नज़रों का मेरा यूं फेर लेना
कुछ तो था उस पल में जो मुझे आज भी याद है
ट्रेन का यूं तेज़ चलना और लोगों का हमसे टकराना
मैं लड़खड़ाए अपने आप को संभाल रही थी
और तभी उस शख़्स का हाथ देना
और मेरी निगाहों का मना करना मजबूरी को समझते हुए
मेरा उसके कंधे पे लगे बैग को पकड़ लेना
और फिर दो नज़रों का दो दिशाओं में देखना
बस यही वो पल था
जब मेरी ज़िंदगी में भी ये लम्हा आया था
मेरी क़िस्मत ने मुझे उस शख़्स से मिलवाया था

दोस्ती

चलों आज एक बात बताती हूँ
हैं दोस्ती क्या थोड़ा समझाती हूँ
हर रिश्ते की शुरुआत इसी से होती है
जिंदगी में रोनक तो बस दोस्तों से होती है
जो तेरी ख़ामोशी को भी समझ जाए
रोये जो तू कभी तो आंख उसकी भी भर आए
जो तेरी शैतानी में हिस्सा बन जाए
देर रात फोन कर जो पूरी गाथा सुनाए
बिना कहे वो रह कहां पाए
जशन जो तेरी कामयाबी पर मनाए हों
निराशा तुझे तो जीना सिखाए
परेशानी बड़ी हो या छोटी तुझे होंसला देती है
जो हर हाल में तेरे साथ रहती है
वहीं है तेरी सच्ची दोस्त और यही दोस्ती कहलाती हैं

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दर्द की किताब

हाल-ए-दिल बयान करने के लिए मैं जब भी कुछ लिखती हूँ
क़लम और स्याही साथ रखती हूँ

हुनर नहीं है इतना की दुनिया को दिखा पाऊं
मैं तो बस अपने दर्द की किताब लिखती हूँ

ना ज़ुस्तज़ू है कुछ पाने की ना खोने का डर है
उम्मीदों से ही सजा मेरा एक घर है

ना कुर्बत है किसी से ना बेरुखी ही रखती हूँ
मैं तो बस अपने दर्द की किताब लिखती हूँ

ना सफ़र है मेरा ना मंजिल का है पता
भूल करू कोई या कर दू कोई खता

मैं कहां किसी को समझा पाती हूँ
मैं तो बस अपने दर्द की किताब लिखती हूँ

शौक़ नहीं रुपयों का ना चाह है दौलत की
ताउम्र लिखूं बस यही एक हसरत है

मेरे लिए तो कोरा कागज़ ही काफ़ी है
क़लम और स्याही ही मेरे साथी हैं

पूछे कोई वज़ह अगर मैं कहां बता पाती हूँ
मैं तो बस अपने दर्द की किताब लिखती हूँ

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