Durga Saptshati

Devi Kavach | Durga Kavach | Devi Kavach Path Hindi me |

जीवन में कुछ न कुछ समस्याएँ तो होती ही रहती है लेकिन हर समस्या का समाधान भी होता है | जीवन है तो समस्याएं है, लेकिन इसे लेकिन कर दिन भर चिंतामग्न होने से कुछ हासिल नहीं होगा | कहते है न आध्यात्म में हर समस्या का समाधान होता है Devi Kavach एक ऐसा पाठ है जिसे नियमित ढंग से करने पर जीवन में चल रही समस्याओं को दूर किया जा सकता है |

अब तो वैज्ञानिक भी मानने लगे है की उनके ऊपर आध्यात्म है . आध्यात्मिक शक्तियों को अनुभाव् के धरातल पर ही हम पा सकते है | इस आर्टिकल में हम आपको Devi Kavach करने के नियम और विधि बताने जा रहे है जिसे नियमित रूप से करने पर आपकी समस्याएं धीरे धीरे दूर होने लगती है |

Devi Kavach-देव्याः कवचम पाठ कैसे करे ?

पाठ में विधि का ध्यान रखना उत्तम तो है ही उससे भी उत्तम है माता के चरणों में प्रेम पूर्वक ध्यान | आईये जाने  करने की संपूर्ण विधि ,

  • Devi Kavach करने से पहले हमे इस मंत्र का उच्चारण अवसय कर लेना चाहिए |

अथ मन्त्रः

ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ग्लौं हुं क्लीं जूं सः

 ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्वल प्रज्वल

 ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट् स्वाहा

नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनि

नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनि ॥१

 नमस्ते शुम्भहन्त्र्यै निशुम्भासुरघातिनि

 जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ॥२

 ऐंकारी सृष्टिरूपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका

 क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ॥३

 चामुण्डा चण्डघाती यैकारी वरदायिनी

विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणि ॥४

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वू वागधीश्वरी

क्रां क्रीं क्रू कालिका देवि शां शी शृं मे शुभं कुरु ॥५

हुं हुं हुंकाररूपिण्यै जं जं जं जम्भनादिनी

भ्रां भ्रीं धूं भैरवी भद्रे भवान्यै ते नमो नमः ॥६

 अं कं चं टं तं पं यं शं वीं दुं ऐं वीं हं क्षं

 धिजाग्रं धिजाग्रं त्रोटय त्रोटय दीप्तं कुरु कुरु स्वाहा ॥७

पां पी पूं पार्वती पूर्णा खां खी खू खेचरी तथा

सां सीं तूं सप्तशती देव्या मन्त्रसिद्धिं कुरुष्व मे ॥८॥

  • इसे करने के पश्चात हमें दाहिने हाथ में जल लेकर दिए हुए मंत्र को पढ़ना चाहिए |

अस्य श्रीचण्डीकवचस्य ब्रह्मा ऋषिः , अनुष्टुप् छन्दः , चामुण्डा देवता , अङ्गन्यासोक्तपातरो बीजम् , दिग्बन्धदेवतास्तत्त्वम् , श्रीजगदम्बाप्रीत्यर्थे सप्तशतीपाठाङ्गत्वेन जपे विनियोगः

  • इसके बाद हाथ में लिए जल को ज़मींन पर गिरा देना चाहिए और फिर Devi Kavach पाठ की शुरुआत करनी चाहिए |

नमश्चण्डिकायै

मार्कण्डेय उवाच

  यद्गुह्यं परमं लोके सर्वरक्षाकरं नृणाम्

 यन्न कस्यचिदाख्यातं तन्मे ब्रूहि पितामह ॥१

चण्डिका देवीको नमस्कार है

मार्कण्डेयजीने कहा – पितामह ! जो इस संसारमें परम गोपनीय तथा मनुष्योंकी सब प्रकारसे रक्षा करनेवाला है और जो अबतक आपने दूसरे किसीके सामने प्रकट नहीं किया हो , ऐसा कोई साधन मुझे बताइये ॥१ ॥

ब्रह्मोवाच अस्ति गुह्यतमं विप्र सर्वभूतोपकारकम्

 देव्यास्तु कवचं पुण्यं तच्छृणुष्व महामुने ॥२

ब्रह्माजी बोले – ब्रह्मन् ! ऐसा साधन तो एक देवीका कवच ही है , जो गोपनीयसे भी परम गोपनीय , पवित्र तथा सम्पूर्ण प्राणियोंका उपकार करनेवाला है । महामुने ! उसे श्रवण करो ॥२ ॥

प्रथमं शैलपुत्री द्वितीयं ब्रह्मचारिणी

 तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ॥३

पञ्चमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति

सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ॥४

नवमं सिद्धिदात्री नवदुर्गाः प्रकीर्तिताः

 उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ॥५

देवीकी नौ मूर्तियाँ हैं , जिन्हें ‘ नवदुर्गा ‘ कहते हैं । उनके पृथक् – पृथक् नाम बतलाये जाते हैं । प्रथम नाम शैलपुत्री *है ।दूसरी मूर्तिका नाम ब्रह्मचारिणी है । तीसरा स्वरूप चन्द्रघण्टा के नामसे प्रसिद्ध है । चौथी मूर्तिको कूष्माण्डा कहते हैं ।

पाँचवीं दुर्गाका नाम स्कन्दमाता है । देवीके छठे रूपको कात्यायनी ‘ कहते हैं । सातवाँ कालरात्रि और आठवाँ स्वरूप महागौरी के नामसे प्रसिद्ध है । नवी दुर्गाका नाम सिद्धिदात्री है । ये सब नाम सर्वज्ञ महात्मा वेदभगवान्के द्वारा ही प्रतिपादित हुए हैं॥३-५ ॥

अग्निना दह्यमानस्तु शत्रुमध्ये गतो रणे

 विषमे दर्गमे चैव भयार्ताः शरणं गताः ॥६

तेषां जायते किंचिदशुभं रणसंकटे

 नापदं तस्य पश्यामि शोकदुःखभयं हि

जो मनुष्य अग्निमें जल रहा हो , रणभूमिमें शत्रुओंसे घिर गया हो , विषम संकटमें फँस गया हो तथा इस प्रकार भयसे आतुर होकर जो भगवती दुर्गाकी शरणमें प्राप्त हुए हों , उनका कभी कोई अमंगल नहीं होता ।  युद्धके समय संकटमें पड़नेपर भी उनके ऊपर कोई विपत्ति नहीं दिखायी देती । उन्हें शोक , दुःख और भयकी प्राप्ति नहीं होती॥६-७ ॥

यैस्तु भक्त्या स्मृता नूनं तेषां वृद्धिः प्रजायते

 ये त्वां स्मरन्ति देवेशि रक्षसे तान्न संशयः

जिन्होंने भक्तिपूर्वक देवीका स्मरण किया है , उनका निश्चय ही अभ्युदय होता है । देवेश्वरि ! जो तुम्हारा चिन्तन करते हैं , उनकी तुम निःसन्देह रक्षा करती हो ॥८ ॥

प्रेतसंस्था तु चामुण्डा वाराही महिषासना

 ऐन्द्री गजसमारूढा वैष्णवी गरुडासना

चामुण्डादेवी प्रेतपर आरूढ़ होती हैं । वाराही भैंसेपर सवारी करती हैं । ऐन्द्रीका वाहन ऐरावत हाथी है । वैष्णवीदेवी गरुडपर ही आसन जमाती हैं॥९॥

माहेश्वरी वृषारूढा कौमारी शिखिवाहना

 लक्ष्मीः पद्मासना देवी पद्महस्ता हरिप्रिया ॥१०

माहेश्वरी वृषभपर आरूढ़ होती हैं । कौमारीका वाहन मयूर है । भगवान् विष्णुकी प्रियतमा लक्ष्मीदेवी कमलके आसनपर विराजमान हैं और हाथोंमें कमल धारण किये हुए हैं ॥१० ॥

श्वेतरूपधरा देवी ईश्वरी वृषवाहना

ब्राह्मी हंससमारूढा सर्वाभरणभूषिता ॥११

वृषभपर आरूढ़ ईश्वरीदेवीने श्वेत रूप धारण कर रखा है । ब्राह्मीदेवी हंसपर बैठी हुई हैं और सब प्रकारके आभूषणोंसे विभूषित हैं ॥११ ॥

इत्येता मातरः सर्वाः सर्वयोगसमन्विताः

 नानाभरणशोभाढ्या नानारत्नोपशोभिताः ॥१२

इस प्रकार ये सभी माताएँ सब प्रकारको योगशक्तियोंसे सम्पन्न हैं । इनके सिवा और भी बहुत – सी देवियाँ हैं , जो अनेक प्रकारके आभूषणोंकी शोभासे युक्त तथा नाना प्रकारके रत्नोंसे सुशोभित हैं ॥१२ ॥

दृश्यन्ते रथमारूढा देव्यः क्रोधसमाकुलाः

शङ्ख चक्रं गदां शक्तिं हलं मुसलायुधम् ॥१३

 खेटकं तोमरं चैव परशुं पाशमेव

 कुन्तायुधं त्रिशूलं शार्ङ्गमायुधमुत्तमम् ॥१४

दैत्यानां देहनाशाय भक्तानामभयाय

 धारयन्त्यायुधानीत्थं देवानां हिताय वै ॥१५

ये सम्पूर्ण देवियाँ क्रोधमें भरी हुई हैं और भक्तोंकी रक्षाके लिये रथपर बैठी दिखायी देती हैं ।

ये शंख , चक्र , गदा , शक्ति , हल और मुसल , खेटक और तोमर , परशु तथा पाश , कुन्त और त्रिशूल एवं उत्तम शार्ङ्गधनुष आदि अस्त्र – शस्त्र अपने हाथोंमें धारण करती हैं ।

दैत्योंके शरीरका नाश करना , भक्तोंको अभयदान देना और देवताओंका कल्याण करना – यही उनके शस्त्र – धारणका उद्देश्य है॥१३-१५ ॥

 नमस्तेऽस्तु महारौद्रे महारौद्रे महाघोरपराक्रमे

महाबले महोत्साहे महाभयविनाशिनि ॥१६

[ कवच आरम्भ करनेके पहले इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये- ]

महान् रौद्ररूप , अत्यन्त घोर पराक्रम , महान् बल और महान् उत्साहवाली देवि ! तुम महान् भयका नाश करनेवाली हो , तुम्हें नमस्कार है ॥ १६॥

 त्राहि मां देवि दुष्प्रेक्ष्ये शत्रूणां भयवर्धिनि

प्राच्यां रक्षतु मामैन्द्री आग्नेय्यामग्निदेवता ॥१७

 दक्षिणेऽवतु वाराही नैर्ऋत्यां खड्गधारिणी

 प्रतीच्यां वारुणी रक्षेद् वायव्यां मृगवाहिनी ॥१८

तुम्हारी ओर देखना भी कठिन है । शत्रुओंका भय बढ़ानेवाली जगदम्बिके ! मेरी रक्षा करो ।

पूर्व दिशामें ऐन्द्री ( इन्द्रशक्ति ) मेरी रक्षा करे । अग्निकोणमें अग्निशक्ति , दक्षिण दिशामें वाराही तथा नैर्ऋत्यकोणमें खड्गधारिणी मेरी रक्षा करे ।

पश्चिम दिशामें वारुणी और वायव्यकोणमें मृगपर सवारी करनेवाली देवी मेरी रक्षा करे॥१७-१८ ॥

उदीच्यां पातु कौमारी ऐशान्यां शूलधारिणी

 ऊर्ध्वं ब्रह्माणि मे रक्षेदधस्ताद् वैष्णवी तथा ॥१

उत्तर दिशामें कौमारी और ईशान – कोणमें शूलधारिणीदेवी रक्षा करे ।

ब्रह्माणि ! तुम ऊपरकी ओरसे मेरी रक्षा करो और वैष्णवीदेवी नीचेकी ओरसे मेरी रक्षा करे ॥१ ९ ॥

 एवं दश दिशो रक्षेच्चामुण्डा शववाहना

जया मे चाग्रतः पातु विजया पातु पृष्ठतः ॥२०

इसी प्रकार शवको अपना वाहन बनानेवाली चामुण्डादेवी दसों दिशाओंमें मेरी रक्षा करे ।

जया आगेसे और विजया पीछेकी ओरसे मेरी रक्षा करे ॥२० ॥

अजिता वामपार्वे तु दक्षिणे चापराजिता

 शिखामुद्योतिनी रक्षेदुमा मूर्ध्नि व्यवस्थिता ॥२१

वामभागमें अजिता और दक्षिणभागमें अपराजिता रक्षा करे । उद्योतिनी शिखाकी रक्षा करे ।

उमा मेरे मस्तकपर विराजमान होकर रक्षा करे ॥२१ ॥

 मालाधरी ललाटे भ्रुवौ रक्षेद् यशस्विनी

त्रिनेत्रा भ्रुवोर्मध्ये यमघण्टा नासिके ॥२२

ललाटमें मालाधरी रक्षा करे और यशस्विनीदेवी मेरी भौंहोंका संरक्षण करे ।

भौंहोंके मध्यभागमें त्रिनेत्रा और नथुनोंकी यमघण्टादेवी रक्षा करे ॥ २२॥

शङ्खिनी चक्षुषोर्मध्ये श्रोत्रयोरवासिनी

 कपोलौ कालिका रक्षेत्कर्णमूले तु शांकरी ॥२३

दोनों नेत्रोंके मध्यभागमें शंखिनी और कानोंमें द्वारवासिनी रक्षा करे ।

कालिकादेवी कपोलोंकी तथा भगवती शांकरी कानोंके मूलभागकी रक्षा करे ॥ २३ ॥

नासिकायां सुगन्धा उत्तरोष्ठे चर्चिका

अधरे चामृतकला जिह्वायां सरस्वती ॥२४

नासिकामें सुगन्धा और ऊपरके ओठमें चर्चिकादेवी रक्षा करे ।

नीचेके ओठमें अमृतकला तथा जिह्वामें सरस्वतीदेवी रक्षा करे ॥२४ ॥

दन्तान् रक्षतु कौमारी कण्ठदेशे तु चण्डिका

 घण्टिका चित्रघण्टा महामाया तालुके २५

कौमारी दाँतोंकी और चण्डिका कण्ठप्रदेशकी रक्षा करे ।

चित्रघण्टा गलेको घाँटीकी और महामाया तालुमें रहकर रक्षा करे ॥२५ ॥

 कामाक्षी चिबुकं रक्षेद् वाचं मे सर्वमङ्गला

ग्रीवायां भद्रकाली पृष्ठवंशे धनुर्धरी ॥२६

कामाक्षी ठोढ़ीकी और सर्वमंगला मेरी वाणीकी रक्षा करे ।

भद्रकाली ग्रीवामें और धनुर्धरी पृष्ठवंश ( मेरुदण्ड ) -में रहकर रक्षा करे ॥२६ ॥

 नीलग्रीवा बहिःकण्ठे नलिकां नलकूबरी

स्कन्धयोः खड्गिनी रक्षेद् बाहू मे वज्रधारिणी ॥२७

कण्ठके बाहरी भागमें नीलग्रीवा और कण्ठकी नलीमें नलकूबरी रक्षा करे ।

दोनों कंधोंमें खड्गिनी और मेरी दोनों भुजाओंकी वज्रधारिणी रक्षा करे ॥२७ ॥

हस्तयोर्दण्डिनी रक्षेदम्बिका चाङ्गुलीषु

 नखाञ्छूलेश्वरी रक्षेत्कुक्षौ रक्षेत्कुलेश्वरी ॥२८

दोनों हाथोंमें दण्डिनी और अंगुलियोंमें अम्बिका रक्षा करे । शूलेश्वरी नखोंकी रक्षा करे ।

कुलेश्वरी कुक्षि ( पेट ) -में रहकर रक्षा करे ॥२८ ॥

स्तनौ रक्षेन्महादेवी मनः शोकविनाशिनी

 हृदये ललिता देवी उदरे शूलधारिणी ॥२

महादेवी दोनों स्तनोंकी और शोकविनाशिनीदेवी मनकी रक्षा करे ।

ललितादेवी हृदयमें और शूलधारिणी उदरमें रहकर रक्षा करे ॥ २ ९ ॥

नाभौ कामिनी रक्षेद् गुह्यं गुह्येश्वरी तथा

 पूतना कामिका मेद्रं गुदे महिषवाहिनी ॥३०

नाभिमें कामिनी और गुह्यभागकी गुह्येश्वरी रक्षा करे ।

पूतना और कामिका लिंगको और महिषवाहिनी गुदाकी रक्षा करे ॥३० ॥

कट्यां भगवती रक्षेज्जानुनी विन्ध्यवासिनी

 जो महाबला रक्षेत्सर्वकामप्रदायिनी ॥३१

भगवती कटिभागमें और विन्ध्यवासिनी घुटनोंकी रक्षा करे ।

सम्पूर्ण कामनाओंको देनेवाली महाबलादेवी दोनों पिण्डलियोंकी रक्षा करे ॥३१ ॥

 गुल्फयोर्नारसिंही पादपृष्ठे तु तैजसी

 पादाङ्गुलीषु श्री रक्षेत्पादाधस्तलवासिनी ॥३२

नारसिंही दोनों घुट्ठियोंकी और तैजसीदेवी दोनों चरणोंके पृष्ठभागकी रक्षा करे ।

श्रीदेवी पैरोंकी अंगुलियोंमें और तलवासिनी पैरोंके तलुओंमें रहकर रक्षा करे ॥३२ ॥

नखान् दंष्ट्राकराली केशांश्चैवोर्ध्वकेशिनी

 रोमकूपेषु कौबेरी त्वचं वागीश्वरी तथा ॥३३

अपनी दाढ़ोंके कारण भयंकर दिखायी देनेवाली दंष्ट्राकरालीदेवी नखोंकी और ऊर्ध्वकेशिनीदेवी केशोंकी रक्षा करे ।

रोमावलियोंके छिद्रोंमें कौबेरी और त्वचाकी वागीश्वरीदेवी रक्षा करे ॥३३ ॥

 रक्तमज्जावसामांसान्यस्थिमेदांसि पार्वती

 अन्त्राणि कालरात्रिश्च पित्तं मुकुटेश्वरी ॥३४

पार्वतीदेवी रक्त , मज्जा , वसा , मांस , हड्डी और मेदकी रक्षा करे ।

आँतोंकी कालरात्रि और पित्तकी मुकुटेश्वरी रक्षा करे ॥ ३४॥

 पद्मावती पद्मकोशे कफे चूडामणिस्तथा

 ज्वालामुखी नखज्वालामभेद्या सर्वसंधिषु ३५

मूलाधार आदि कमल – कोशोंमें पद्मावतीदेवी और कफमें चूडामणिदेवी स्थित होकर रक्षा करे ।

नखके तेजकी ज्वालामुखी रक्षा करे ।

जिसका किसी भी अस्त्रसे भेदन नहीं हो सकता , वह अभेद्यादेवी शरीरकी समस्त संधियोंमें रहकर रक्षा करे ॥३५ ॥

शुक्रं ब्रह्माणि मे रक्षेच्छायां छत्रेश्वरी तथा

 अहंकारं मनो बुद्धिं रक्षेन्मे धर्मधारिणी ॥३६

ब्रह्माणि ! आप मेरे वीर्यकी रक्षा करें ।

छत्रेश्वरी छायाकी तथा धर्मधारिणी देवी मेरे अहंकार , मन और बुद्धिकी रक्षा करे ॥३६ ॥

प्राणापानौ तथा व्यानमुदानं समानकम्

वज्रहस्ता मे रक्षेत्प्राणं कल्याणशोभना ॥३७

हाथमें वज्र धारण करनेवाली वज्रहस्तादेवी मेरे प्राण , अपान , व्यान , उदान और समान वायुकी रक्षा करे ।

कल्याणसे शोभित होनेवाली भगवती कल्याणशोभना मेरे प्राणकी रक्षा करे ॥३७ ॥

रसे रूपे गन्धे शब्दे स्पर्श योगिनी

 सत्त्वं रजस्तमश्चैव रक्षेन्नारायणी सदा ॥३८

रस , रूप , गन्ध , शब्द और स्पर्श – इन विषयोंका अनुभव करते समय योगिनीदेवी रक्षा करे तथा सत्त्वगुण , रजोगुण और तमोगुणकी रक्षा सदा नारायणीदेवी करे ॥३८ ॥

आयू रक्षतु वाराही धर्म रक्षतु वैष्णवी

यशः कीर्तिं लक्ष्मी धनं विद्यां चक्रिणी

वाराही आयुकी रक्षा करे ।

वैष्णवी धर्मकी रक्षा करे तथा चक्रिणी ( चक्र धारण करनेवाली ) -देवी यश , कीर्ति , लक्ष्मी , धन तथा विद्याकी रक्षा करे ॥ ३ ९ ॥

गोत्रमिन्द्राणि मे रक्षेत्पशून्मे रक्ष चण्डिके

पुत्रान् रक्षेन्महालक्ष्मीर्भार्यां रक्षतु भैरवी ४०

इन्द्राणि ! आप मेरे गोत्रकी रक्षा करें । चण्डिके ! तुम मेरे पशुओंकी रक्षा करो ।

महालक्ष्मी पुत्रोंकी रक्षा करे और भैरवी पत्नीकी रक्षा करे ॥ ४० ॥

पन्थानं सुपथा रक्षेन्मार्ग क्षेमकरी तथा

 राजद्वारे महालक्ष्मीर्विजया सर्वतः स्थिता ॥४१

मेरे पथकी सुपथा तथा मार्गकी क्षेमकरी रक्षा करे ।

राजाके दरबार में महालक्ष्मी रक्षा करे तथा सब ओर व्याप्त रहनेवाली विजयादेवी सम्पूर्ण भयोंसे मेरी रक्षा करे ॥४१ ॥

 रक्षाहीनं तु यत्स्थानं वर्जितं कवचेन तु

तत्सर्वं रक्ष मे देवि जयन्ती पापनाशिनी ॥४२

देवि ! जो स्थान कवचमें नहीं कहा गया है , अतएव रक्षासे रहित है , वह सब तुम्हारे द्वारा सुरक्षित हो ;

क्योंकि तुम विजयशालिनी और पापनाशिनी हो ॥४२ .॥

पदमैकं गच्छेत्तु यदीच्छेच्छुभमात्मनः

 कवचेनावृतो निर्त्य यत्र यत्रैव गच्छति ४३

तत्र तत्रार्थलाभश्च विजयः सार्वकामिकः यं यं चिन्तयते कामं तं तं प्राप्नोति निश्चितम्

परमैश्वर्यमतुलं प्राप्स्यते भूतले पुमान् ॥४४

यदि अपने शरीरका भला चाहे तो मनुष्य बिना कवचके कहीं एक पग भी न जाय – कवचका पाठ करके ही यात्रा करे ।

कवचके द्वारा सब ओरसे सुरक्षित मनुष्य जहाँ – जहाँ भी जाता है , वहाँ – वहाँ उसे धन – लाभ होता है तथा सम्पूर्ण कामनाओंकी सिद्धि करनेवाली विजयकी प्राप्ति होती है ।

वह जिस जिस अभीष्ट वस्तुका चिन्तन करता है , उस – उसको निश्चय ही प्राप्त कर लेता है ।

वह पुरुष इस पृथ्वीपर तुलनारहित महान् ऐश्वर्यका भागी होता है॥४३-४४ ॥

निर्भयो जायते मर्त्यः संग्रामेष्वपराजितः

त्रैलोक्ये तु भवेत्पूज्य : कवचेनावृतः पुमान् ४५

Devi Kavach से सुरक्षित मनुष्य निर्भय हो जाता है ।

युद्धमें उसकी पराजय नहीं होती तथा वह तीनों लोकोंमें पूजनीय होता है ॥ ४५ ॥

इदं तु देव्याः कवचं देवानामपि दुर्लभम्

 यः पठेत्प्रयतो नित्यं त्रिसन्ध्यं श्रद्धयान्वितः ॥४६

दैवी कला भवेत्तस्य त्रैलोक्येष्वपराजितः

जीवेद् वर्षशतं साग्रमपमृत्युविवर्जितः ॥४७

Devi Kavach यह कवच देवताओं के लिये भी दुर्लभ है । जो प्रतिदिन नियमपूर्वक तीनों संध्याओंके समय श्रद्धाके साथ इसका पाठ करता है ,

उसे दैवी कला प्राप्त होती है तथा वह तीनों लोकोंमें कहीं भी पराजित नहीं होता ।

इतना ही नहीं , वह अपमृत्युसे * रहित हो सौसे भी अधिक वर्षों तक जीवित रहता है॥४६-४७ ॥

नश्यन्ति व्याधयः सर्वे लूताविस्फोटकादयः

स्थावरं जङ्गमं चैव कृत्रिमं चापि यद्विषम् ॥४८

– मकरी , चेचक और कोढ़ आदि उसकी सम्पूर्ण व्याधियाँ नष्ट हो जाती हैं ।

कनेर , भाँग , अफीम , धतूरे आदिका स्थावर विष , साँप और बिच्छू आदिके काटनेसे चढ़ा हुआ जंगम विष तथा अहिफेन और तेलके संयोग आदिसे बननेवाला कृत्रिम विष – ये सभी प्रकारके विष दूर हो जाते हैं , उनका कोई असर नहीं होता ॥ ४८॥

 अभिचाराणि सर्वाणि मन्त्रयन्त्राणि भूतले

भूचराः खेचराश्चैव जलजाश्चोपदेशिकाः ॥४

सहजा कुलजा माला डाकिनी शाकिनी तथा

 अन्तरिक्षचरा घोरा डाकिन्यश्च महाबलाः ॥५०

 ग्रहभूतपिशाचाश्च यक्षगन्धर्वराक्षसाः

 ब्रह्मराक्षसवेताला : कूष्माण्डा भैरवादयः ॥५१

 नश्यन्ति दर्शनात्तस्य कवचे हृदि संस्थिते

 मानोन्नतिर्भवेद् राज्ञस्तेजोवृद्धिकरं परम् ॥५२

इस पृथ्वीपर मारण – मोहन आदि जितने आभिचारिक प्रयोग होते हैं तथा इस प्रकारके जितने मन्त्र – यन्त्र होते हैं ,

वे सब इस कवचको हृदयमें धारण कर लेनेपर उस मनुष्यको देखते ही नष्ट हो जाते हैं ।

ये ही नहीं , पृथ्वीपर विचरनेवाले ग्रामदेवता , आकाशचारी देवविशेष , जलके सम्बन्धसे प्रकट होनेवाले गण , उपदेशमात्रसे सिद्ध होनेवाले निम्नकोटिके देवता , अपने जन्मके साथ प्रकट होनेवाले देवता , कुलदेवता , माला ( कण्ठमाला आदि ) , डाकिनी , शाकिनी , अन्तरिक्षमें विचरनेवाली अत्यन्त बलवती भयानक डाकिनियाँ , ग्रह , भूत , पिशाच , यक्ष , गन्धर्व , राक्षस , ब्रह्मराक्षस , बेताल , कूष्माण्ड और भैरव आदि अनिष्टकारक देवता भी हृदयमें कवच धारण किये रहनेपर उस मनुष्यको देखते ही भाग जाते हैं ।

कवचधारी पुरुषको राजासे सम्मान – वृद्धि प्राप्त होतो है ।

यह कवच मनुष्यके तेजकी वृद्धि करनेवाला और उत्तम है ॥ ४ ९ -५२ ॥

यशसा वर्धते सोऽपि कीर्तिमण्डितभूतले

जपेत्सप्तशती चण्डी कृत्वा तु कवचं पुरा ॥५३

 यावद्भूमण्डलं धत्ते सशैलवनकाननम्

 तावत्तिष्ठति मेदिन्यां संततिः पुत्रपौत्रिकी ॥५४

Devi Kavach का पाठ करनेवाला पुरुष अपनी कीर्तिसे विभूषित भूतलपर अपने सुयशके साथ – साथ वृद्धिको प्राप्त होता है ।

जो पहले कवचका पाठ करके उसके बाद सप्तशती चण्डीका पाठ करता है , उसकी जबतक वन , पर्वत और काननोंसहित यह पृथ्वी टिकी रहती है ,

तबतक यहाँ पुत्र – पौत्र आदि संतानपरम्परा बनी रहती है॥५३-५४ ॥

 देहान्ते परमं स्थानं यत्सुरैरपि दुर्लभम्

प्राप्नोति पुरुषो नित्यं महामायाप्रसादतः ॥५५

फिर देहका अन्त होनेपर वह पुरुष भगवती महामायाके प्रसादसे उस नित्य परमपदको प्राप्त होता है , जो देवताओंके लिये भी दुर्लभ है

॥५५ ॥

 लभते परमं रूपं शिवेन सह मोदते॥ॐ ॥५६

वह सुन्दर दिव्य रूप धारण करता और कल्याणमय शिवके साथ आनन्दका भागी होता है ॥५६ ॥

इति देव्याः कवचं सम्पूर्णम्

ऊपर दिए सरे मंत्र श्री दुर्गा सप्तशती सचित्र पुश्तक से लिए गए।

Devi Kavach-देव्याः कवचम

  •  Devi Kavach पाठ पूर्ण करने के बाद हमे फिर से अथ मन्त्रः को पढ़ना चाहिए इससे हमारा पाठ कवच के रूप में बदल जाता है |

आशा करता हु क़ि  प्रेमी पाठक Devi Kavach-देव्याः कवचम से लाभ उठायेंगे उठाएंगे श्रद्धा और भक्ति से पाठ करने वालो को माता की कृपा शीघ्र ही प्राप्त हो जाती है |

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अगर आप इस पाठ का हिंदी अनुवाद चाहते है तो कमेंट करके हमे बताए |

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3 thoughts on “Devi Kavach | Durga Kavach | Devi Kavach Path Hindi me |”

  1. Sanjay Tripathi

    यह वास्तव मे लाभ कारी हो सकता है। अच्छा प्रयास।

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