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भारतीय संस्कृति/सभ्यता पर पश्चिमी सभय्ता का कुठाराघात

किसी भी सभ्यता अथवा संस्कृति की अच्छाइयों एवं बुराइयों को उतना ही ग्रहण करना चाहिए |

जो हमारी भारतीय संस्कृति/सभ्यता  के मूल पर कोई आघात न कर सके।

परंतु हम भारतवंशी इतने दयालु है कि अपने मूल का नाश करके भी हर जगह से कुछ न कुछ लेते रहते है ।

इतिहास में इस तरह के अनेकों प्रमाण मौजूद है परंतु आज हम उन तामाम प्रमाणों का जिक्र नही करेंगें |

हम आज बात करेंगे विश्व भर में फैले पाश्चात्य सभ्यता एवं संस्कृति की उन बुराइयों की जिन्हें हमने बहुत ही सहजता के साथ अच्छाई मान कर स्वीकार ही नही किया

परंतु उसके जश्न का दिखावा बड़े शान से करते आ रहे है और आगे भी करते रहेंगें ।

आज भारतवर्ष ही नही अपितु पूरे विश्व मे जितने भी “डे” मनाये जाते है ये पाश्चात्य सभ्यता के तमाम बुराइयों में से एक है

जहाँ पर “परिवार” और “समाज” की कोई परिकल्पना नही ।

भारत दुनिया का एक मात्र ऐसा देश है जिसने “परिवार” की परिकल्पना को जीवन का आधार बनाया और गाहे-बगाहे पूरा विश्व इसे स्वीकार भी करता है और सीखता भी है ।

आज विश्व के तमाम बड़े विश्वविद्यालयों में भारतीय संस्कृति एवं सभ्यता पर शोध हो रहे है

और भारतीय संस्कृति/सभय्ता में वर्णित जीवन पद्धतियों को अपना भी रहे है

परंतु भारत मे खुलने वाले ढ़ेर सारे वृद्धाश्रम एवं अनाथालय ये सिद्ध करने के लिए पर्याप्त है

” भारतीयों ने अपनी सभ्यता से मुँह मोड़ लिया तथा विदेशी सभ्यताओं की तरफ आकर्षित हो गए ।”

आज “मदर डे, फादर डे, टीचर डे” आदि के नाम पर जोर शोर से दिखावे हो रहे है ,

फेसबुक, ट्विटर , व्हाट्सएप, इंस्टाग्राम, टिकटोक पर बिना सोचे समझे तस्वीरों के साथ खूब पोस्ट हो रहे है

एक तरह से खूब विज्ञापन हो रहा है वो भी रोज नही सिर्फ एक दिन।

भारतीय संस्कृति/सभ्यता तो  वसुधैव कुटुम्बकम्  के सिद्धांत को प्रतिपादित करने वाला देश है

तो फिर कैसे यहाँ पर मदर डे, फादर डे ,टीचर डे आ गया ?

भारतीय संस्कृति जिसमें यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवताः को मूल मंत्र माना गया वहाँ आखिर क्या कारण रहा कि

हमें नारी के प्रति अपने सम्मान को प्रकट करने के लिए सिर्फ एक दिन का निर्धारण करना पड़ा ?

जिस भारतीय संस्कृति/सभ्यता ने,

गुरुर ब्रह्मा गुरुर विष्णु , गुरुर देवो महेश्वरः ,

गुरुर साक्षात परम ब्रह्म , तस्मै श्री गुरवे नमः ||

का परम ज्ञान दिया उस भारत मे टीचर डे का क्या अर्थ ?

अगर हम इन तमाम प्रश्नों के उत्तरों की तलाश करें तो पता चलता है कि जो भारतीय संस्कृति पूरे विश्व मे ज्ञान और उत्कृष्ठ जीवन शैली का उदाहरण बन चुका है

वही के निवासियों ने अपनी संस्कृति का त्याग कर दुनिया के सबसे बेकार संस्कृति के तरफ आकर्षित हो गया ।

शायद भारतीय संस्कृति भी अकेले में बैठ के ये सोच रही होगी कि मुझे मेरे अपनो ने ठुकरा के जो दर्द दिया उससे कही ज्यादा दर्द हर रोज मुझ पर पिछड़ा होने का आरोप लगा कर दिया ।

भारतीय संस्कृति वैसे तो हर काल मे ठगी गई और वही इस काल मे भी हो रहा है

परंतु जितना ज्यादा इसके साथ भारतीयों ने दुर्व्यवहार किया उतना किसी ने नही किया यही कारण है कि विश्व को राह दिखाने वाला भारत आज राह विहीन है ।

विश्वगुरु कहलाने वाले भारत मे ज्ञान की इतनी कमी हो गई कि विश्व के सर्वश्रेष्ठ विश्वविद्यालयों में कोई भारतीय विश्वविद्यालय नही ।

विश्व को आयुर्वेद एवं योग देने वाले भारत के लोग एलोपैथ को श्रेष्ठ मानते ही नही अपितु योग और आयुर्वेद को निराधार भी बताते है ।

अब वक्त आ गया है जब हमें अपने मूल विरासत की ओर लौटना होगा,

हमें अपनी विरासत को मूलभूत रूप में आने वाली पीढ़ी को देना होगा ,

अन्यथा समूल विश्व भारतीय संस्कृति को अपना कर बच जाएगा लेकिन हम भारतीय स्वयं अपना नाश कर लेंगे ।

हमें किसी एक की विशेषता को छोड़ कर हरेक दिन को अपने आचरण में लाना होगा ।

हमें फेसबुक, ट्विटर , इंस्टाग्राम, व्हाट्सएप, टिकटोक को असल दुनिया न मान कर असल दुनिया मे लौटना होगा ।

अगर अब भी नही संभले तो

आने वाले कुछ वर्षों में हम काजल का पहाड़ बन जाएंगे जहाँ पर सिर्फ और सिर्फ बुराइयाँ ही वास करती है ।

अगर आपको ये आर्टिकल अच्छी लगी तो कमेंट करे , धन्यवाद।।

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_वेद प्रकाश राय ‘एहसास’

भारतीय संस्कृति/सभय्ता

 

21 thoughts on “भारतीय संस्कृति/सभ्यता पर पश्चिमी सभय्ता का कुठाराघात”

  1. अद्भुत लेखन। वास्तविकता को अच्छी तरीके से पेश किया आपने।समय पर जागना होगा सभी को।

  2. Sanjay Tripathi

    भारतीय संस्कृति के तरफ ध्यानाकषर्ण का अच्छा प्रयास।

  3. वेद प्रकाश राय'एहसास'

    आपके प्रेम, स्नेह और आशीर्वाद के लिए आभार ।

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